वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 306, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २४-२५ ] अध्याय ३ ३०३ अपि च संराधने प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥ ३ । २ । २४ ॥ अपि च=इस प्रकार अव्यक्त होनेपर भी; संराधने=आराधना करनेपर (उपासक परमेश्वरका प्रत्यक्ष दर्शन पाते हैं); प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् = यह बात वेद और स्मृति—दोनोंके ही कथनसे सिद्ध होती है। व्याख्या—श्रुतियों और स्मृतियोंमें जहाँ सगुण और निर्गुण परमेश्वरको इन्द्रियादिके द्वारा देखनेमें न आनेवाला बताया है, वहीं यह भी कहा है कि वह परमात्मा नामजप, स्मरण, ध्यान आदि आराधनाओं द्वारा प्रत्यक्ष होनेवाला भी है (मु० उ० ३ । १ । ८;* श्वेता० १ । ३, १०; २ । १५ तथा श्रीमद्भगवद्गीता ११। ५४)। इस तरहके अनेक प्रमाण हैं। वेद और स्मृतियोंके इन वचनोंमें उस सगुण-निर्गुणस्वरूप परब्रह्म परमात्माको आराधनाके द्वारा प्रत्यक्ष होनेवाला बताया गया है, इसलिये यह सिद्ध होता है कि उसके प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। भगवान्ने स्वयं कहा है—'हे अर्जुन! अनन्य भक्तिके द्वारा ही मुझे तत्त्वसे जाना जा सकता है। मेरा दर्शन हो सकता और मुझमें प्रवेश किया जा सकता है।' (११ । ५४) इसलिये भी यही सिद्ध होता है कि वह परब्रह्म परमेश्वर अवश्य है और वह सगुण तथा निर्गुण—दोनों ही लक्षणोंवाला है। सम्बन्ध—उस परमेश्वरका स्वरूप आराधनासे जाननेमें आता है, अन्यथा नहीं, इस कथनसे तो यह सिद्ध होता है कि वास्तवमें परमात्मा निर्विशेष ही है, केवल भक्तके लिये आराधनाकालमें सगुण होता है, ऐसी शंका होनेपर कहते हैं— प्रकाशादिवच्चावैशेष्यं प्रकाशश्च कर्मण्यभ्यासात् ॥ ३ । २ । २५ ॥ प्रकाशादिवत् = अग्नि आदिके प्रकाशादि गुणोंकी भाँति; च=ही; अवैशेष्यम् = (परमात्मामें भी) भेद नहीं है; प्रकाशः = प्रकाश; च=भी; कर्मणि = कर्ममें; अभ्यासात् = अभ्यास करनेसे ही (प्रकट होता है)। व्याख्या—जिस प्रकार अग्नि और बिजली आदि तत्त्व प्रकाश और
- ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥