वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २०-२१ ] अध्याय ३ २९९ परमेश्वरकी स्थिति नहीं है। यहाँ दृष्टान्तका केवल एक अंश लेकर ऐसा समझना चाहिये कि परमेश्वर एक होकर भी नाना-सा दीखता है, वास्तवमें वह नाना नहीं है, तथापि सर्वशक्तिमान् होनेके कारण अलग- अलग प्राणियोंमें एक रूपसे स्थित है। सम्बन्ध—यदि ऐसी बात है तो प्रतिबिम्बका दृष्टान्त क्यों दिया गया ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— वृद्धिह्रासभाक्त्वमन्तर्भावादुभयसामंजस्यादेवम् ॥ ३।२।२०॥ अन्तर्भावात् = शरीरके भीतर स्थित होनेके कारण; वृद्धिह्रासभाक्त्वम् = शरीरकी भाँति परमात्माके बढ़ने-घटनेवाला होनेकी सम्भावना होती है, अतः (उसके निषेधमें); उभयसामंजस्यात् = परमात्मा और चन्द्रप्रतिबिम्ब— इन दोनोंकी समानता है, इसलिये; एवम् = इस प्रकारका दृष्टान्त दिया गया है। व्याख्या—उपमा उपमेय वस्तुके किसी एक अंशकी समानताको लेकर दी जाती है। पूर्णतया दोनोंकी एकता हो जाय तब तो वह उपमा ही नहीं कही जायगी; अपितु वास्तविक वर्णन हो जायगा। अतः यहाँ यह जिस प्रकार चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब जलमें रहता हुआ भी जलके घटने-बढ़ने आदि विकारोंसे सम्बद्ध नहीं होता; वैसे ही परब्रह्म परमेश्वर सबमें रहता हुआ भी निर्विकार रहता है, उनके घटने-बढ़ने आदि किसी भी विकारसे वह लिप्त नहीं होता। इतना ही आशय इस दृष्टान्तका है, इसलिये इस दृष्टान्तसे यह शंका नहीं करनी चाहिये कि परमात्माकी सब प्राणियोंमें जो स्थिति बतायी गयी है, वह भी चन्द्रमाके प्रतिबिम्बकी भाँति अवास्तविक (झूठी) होगी। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पुनः उस भ्रमकी निवृत्ति की जाती है— दर्शनाच्च ॥ ३।२।२१॥ दर्शनात् = श्रुतिमें दूसरे दृष्टान्त देखे जाते हैं, इसलिये; च = भी (यही सिद्ध होता है कि परमात्माकी स्थिति प्रतिबिम्बकी भाँति अवास्तविक नहीं है)।