वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
अलग-अलग नहीं, किंतु एक ही है; तथापि प्रत्येक जीवात्मामें अलग- अलग दिखायी दे रहा है ! यहाँ चन्द्रमाके प्रतिबिम्बका दृष्टान्त देकर यह भाव दिखाया गया है कि जैसे सूर्य और चन्द्रमा आदिमें जो प्रकाश गुण है, वह स्वाभाविक है, उपाधिसे नहीं है; उसी प्रकार परमात्मामें भी जो सत्य- संकल्पत्व, सर्वज्ञत्व और सर्वव्यापित्वादि गुण हैं वे स्वाभाविक हैं, उपाधिसे नहीं हैं। दूसरा यह भाव दिखाया है कि जिस प्रकार चन्द्रमाका प्रतिबिम्ब जलमें अलग-अलग दीखता हुआ भी एक है, उसी प्रकार परमात्मा सब प्राणियोंमें अन्तर्यामीरूपसे अलग-अलगकी भाँति स्थित हुआ भी एक ही है तथा वह सबमें रहता हुआ भी उन-उनके गुण-दोषोंसे अलिप्त है। गीताके निम्नांकित वचनसे भी इसी सिद्धान्तकी पुष्टि होती है 'अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।' 'वह परमात्मा विभागरहित है तो भी विभक्तकी भाँति सब प्राणियोंमें स्थित है' इत्यादि (१३। १६) यही उसकी विचित्र महिमा है। सम्बन्ध—यहाँ प्रतिबिम्बका दृष्टान्त दिया जानेके कारण यह भ्रम हो सकता है कि परमात्माका सब प्राणियोंमें रहना प्रतिबिम्बकी भाँति मिथ्या ही है, वास्तवमें नहीं है; अतः इस भ्रमकी निवृत्तिके लिये अगला सूत्र कहते हैं— अम्बुवदग्रहणात्तु न तथात्वम् ॥ ३। २। १९॥ तु=किंतु; अम्बुवत्=जलमें स्थित चन्द्रमाकी भाँति; अग्रहणात् = परमात्मा- का ग्रहण न होनेके कारण (उस परमेश्वरको); तथात्वम् = सर्वथा वैसा; न=नहीं समझना चाहिये। व्याख्या- पूर्व सूत्रमें परमेश्वरको समस्त प्राणियोंमें स्थित बताते हुए जलमें दीखनेवाले चन्द्रमाका दृष्टान्त दिया; किंतु पूर्णतया वह दृष्टान्त परमात्मामें नहीं घटता; क्योंकि चन्द्रमा वस्तुतः जलमें नहीं है, केवल उसका प्रतिबिम्ब दीखता है परंतु परमात्मा तो स्वयं सबके हृदयमें सचमुच ही स्थित है और उन-उन जीवोंके कर्मानुसार उनको अपनी शक्तिके द्वारा संसारचक्रमें भ्रमण कराता है (गीता १८ । ६१)। अतः चन्द्रमाके प्रतिबिम्बकी भाँति