वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 300, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १८ ] अध्याय ३ २९७ सबको धारण करता है तथा जो सबका ईश्वर एवं अविनाशी है।'१ (१५।१७) इस प्रकार परब्रह्म पुरुषोत्तमके सगुण स्वरूपका वर्णन करके अन्तमें यह भी कहा है कि 'जो मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम जानता है, वह सब कुछ जाननेवाला है'२ (१५।१९)। इस प्रकारके बहुत-से वचन स्मृतियोंमें पाये जाते हैं, जिनमें भगवान्के सगुण रूपका वर्णन है और उसे वास्तविक बताया गया है। इसी तरह श्रुतियों और स्मृतियोंमें परमेश्वरके निर्गुण- निर्विशेष रूपका भी वर्णन पाया जाता है३ और वह भी सत्य है; इसलिये यही सिद्ध होता है कि ब्रह्म दोनों प्रकारके लक्षणोंवाला है। सम्बन्ध— उस परब्रह्म परमेश्वरका सगुण रूप उपाधिभेदसे नहीं, किंतु स्वाभाविक है; इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा प्रमाण देते हैं— अत एव चोपमा सूर्यकादिवत् ॥ ३।२।१८॥ च=और; अत एव=इसीलिये अर्थात् उस परमेश्वरका उभय रूप स्वाभाविक है, यह सिद्ध करनेके लिये ही; सूर्यकादिवत्=सूर्य आदिके प्रतिबिम्बकी भाँति; उपमा=उपमा दी गयी है। व्याख्या—'सब भूतोंका आत्मा परब्रह्म परमेश्वर एक है, तथापि वह भिन्न-भिन्न प्राणियोंमें स्थित है, अतः जलमें प्रतिबिम्बित चन्द्रमाकी भाँति एक और अनेक रूपसे भी दीखता है।'४ (ब्रह्मबिन्दु उ० १२) इस दृष्टान्तसे यह बात दिखायी गयी है कि वह सर्वान्तर्यामी परमेश्वर सगुण और निर्गुण-भेदसे १-उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः। यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥ २-यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्। स सर्वविद्..............................................॥ ३-देखिये कठोपनिषद् १।३।१५, मुण्डक० १।१।६ तथा माण्डूक्य० ७। ४-एक एव हि भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः। एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्॥