वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध—अब पाशुपतोंके दार्शनिक मत निमित्तकारणवादका खण्डन करते हैं— सम्बन्धानुपपत्तेश्च ॥ २।२।३८ ॥ सम्बन्धानुपपत्तेः = सम्बन्धकी सिद्धि न होनेसे; च = भी (यह मान्यता असंगत है)। व्याख्या—पाशुपतोंकी मान्यताके अनुसार यदि ईश्वरको केवल निमित्त कारण माना जाय तो उपादान कारणके साथ उसका किस प्रकार सम्बन्ध होगा, यह बताना आवश्यक है। लोकमें यह देखा जाता है कि शरीरधारी निमित्त कारण कुम्भकार आदि ही घट आदि कार्यके लिये मृत्तिका आदि साधनोंके साथ अपना संयोगसम्बन्ध स्थापित करते हैं; किंतु ईश्वर शरीरादिसे रहित निराकार है, अतः उसका प्रधान आदिके साथ संयोगरूप सम्बन्ध नहीं हो सकता। अतएव उसके द्वारा सृष्टिरचना भी नहीं हो सकेगी। जो लोग वेदको प्रमाण मानते हैं, उनको तो सब बातें युक्तिसे सिद्ध करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि वे परब्रह्म परमेश्वरको वेदके कथनानुसार सर्वशक्तिमान् मानते हैं, अतः वह शक्तिशाली परमेश्वर स्वयं ही निमित्त और उपादान कारण हो सकता है। वेदोंके प्रति जिनकी निष्ठा है, उनके लिये युक्तिका कोई मूल्य नहीं है। वेदमें जो कुछ कहा गया है, वह निर्भ्रान्त सत्य है; युक्ति उसके साथ रहे तो ठीक है, न रहे तो भी कोई चिन्ता नहीं है; किंतु जिनका मत केवल तर्कपर ही अवलम्बित है उनको तो अपनी प्रत्येक बात तर्कसे सिद्ध करनी ही चाहिये। परंतु पाशुपतोंकी उपर्युक्त मान्यता न वेदसे सिद्ध होती है, न तर्कसे ही। अतः वह सर्वथा अमान्य है। सम्बन्ध—अब उक्त मतमें दूसरी अनुपपत्ति दिखलाते हैं— अधिष्ठानानुपपत्तेश्च ॥ २।२।३९ ॥ अधिष्ठानानुपपत्तेः = अधिष्ठानकी उपपत्ति न होनेके कारण; च = भी (ईश्वरको केवल निमित्त कारण मानना उचित नहीं है)।