वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १८ ] अध्याय २ १८५
दीपककी शिखा प्रतिक्षण मिट रही है, फिर भी एक धारा-सी बनी रहनेके कारण उसकी प्रतीति होती है, उसी प्रकार बाह्य पदार्थ भी प्रतिक्षण नष्ट हो रहे हैं, उनकी विज्ञान-धारामात्र प्रतीत होती है। जैसे तैल चुक जानेपर दीपशिखा बुझ जाती है, उसी प्रकार संस्कार नष्ट होनेपर विज्ञान-धारा भी शान्त हो जाती है। इस प्रकार अभाव या शून्यताकी प्राप्ति ही उसकी मान्यताके अनुसार अपवर्ग या मुक्ति है। इस सूत्रमें वैभाषिक तथा सौत्रान्तिकके मतको एक मानकर उसका निराकरण किया जाता है। उन दोनोंकी मान्यताका स्वरूप इस प्रकार है— रूप, विज्ञान, वेदना, संज्ञा तथा संस्कार—ये पाँच स्कन्ध हैं। पृथिवी आदि चार भूत तथा भौतिक वस्तुएँ—शरीर, इन्द्रिय और विषय—ये 'रूपस्कन्ध' कहलाते हैं। पार्थिव परमाणु रूप, रस, गन्ध और स्पर्श—इन चार गुणोंसे युक्त एवं कठोर स्वभाववाले होते हैं; वे ही समुदायरूपमें एकत्र हो पृथिवीके आकारमें संगठित होते हैं। जलीय परमाणु, रूप, रस और स्पर्श—इन तीनोंसे युक्त एवं स्निग्ध स्वभावके होते हैं, वे ही जलके आकारमें संगठित होते हैं। तेजके परमाणु रूप और स्पर्श गुणसे युक्त एवं उष्ण स्वभाववाले हैं; वे अग्निके आकारमें संगठित हो जाते हैं। वायुके परमाणु स्पर्शकी योग्यतावाले एवं गतिशील होते हैं; वे ही वायुरूपमें संगठित होते हैं। फिर पृथिवी आदि चार भूत शरीर, इन्द्रिय और विषयरूपमें संगठित होते हैं। इस तरह ये चार प्रकारके क्षणिक परमाणु हैं, जो भूत-भौतिक संघातकी उत्पत्तिमें कारण बनते हैं। यह परमाणुहेतुक भूत-भौतिक वर्ग ही रूपस्कन्ध एवं बाह्य समुदाय कहलाता है। 'विज्ञानस्कन्ध' कहते हैं आभ्यन्तरिक विज्ञानके प्रवाहको। इसीमें 'मैं' की प्रतीति होती है। यही घट-ज्ञान; पट-ज्ञान आदिके रूपमें अविच्छिन्न धाराकी भाँति स्थित है। इसीको कर्ता, भोक्ता और आत्मा कहते हैं। इसीसे सारा लौकिक व्यवहार चलता है। सुख-दुःख आदिकी अनुभूतिका नाम 'वेदनास्कन्ध' है। उपलक्षणसे जो वस्तुकी प्रतीति करायी जाती है, जैसे ध्वजसे गृहकी और दण्डसे पुरुषकी, उसीका नाम 'संज्ञास्कन्ध'