भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 189, कुल 486 में से

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पृष्ठ 189

१८६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ है। राग, द्वेष, मोह, मद, मात्सर्य, भय, शोक और विषाद आदि जो चित्तके धर्म हैं, उन्हींको 'संस्कारस्कन्ध' कहते हैं। विज्ञान आदि चार स्कन्ध चित्त- चैत्तिक कहलाते हैं। विज्ञानस्कन्धरूप चित्तका नाम ही आत्मा है; शेष तीन स्कन्ध 'चैत्य' अथवा 'चैत्तिक' हैं। ये सब प्रकारके व्यवहारोंका आश्रय बनकर अन्तःकरणमें संगठित होते हैं। यह चारों स्कन्धोंका समुदाय या चित्त-चैत्तिक वर्ग 'आभ्यन्तर समुदाय' कहा गया है। इन दोनों समुदायोंसे भिन्न और किसी वस्तु (आत्मा, आकाश आदि)-की सत्ता ही नहीं है। ये ही दोनों बाह्य और आभ्यन्तर समुदाय समस्त लोक-व्यवहारके निर्वाहक हैं। इनसे ही सब कार्य चल जाता है, इसलिये नित्य 'आत्मा' को माननेकी आवश्यकता ही नहीं है। इसके उत्तरमें कहा जाता है कि परमाणु जिसमें हेतु बताये गये हैं, वह भूत-भौतिक बाह्य समुदाय और स्कन्धहेतुक आभ्यन्तर समुदाय—ये दोनों प्रकारके समुदाय तुम्हारे कथनानुसार मान लिये जायँ तो भी उक्त समुदायकी सिद्धि असम्भव ही है, क्योंकि समुदायके अन्तर्गत जो वस्तुएँ हैं, वे सब अचेतन हैं, एक-दूसरेकी अपेक्षासे शून्य हैं। अतः उनके द्वारा समुदाय अथवा संघात बना लेना असम्भव है। परमाणु आदि सभी वस्तुएँ तुम्हारी मान्यताके अनुसार क्षणिक भी हैं। एक क्षणमें जो परमाणु हैं, वे दूसरे क्षणमें नहीं हैं। फिर वे क्षणविध्वंसी परमाणु और पृथिवी आदि भूत इस समुदाय या संघातके रूपमें एकत्र होनेका प्रयत्न कैसे कर सकते हैं, कैसे उनका संघात बन सकता है अर्थात् किसी प्रकार और कभी भी नहीं बन सकता; इसलिये उनके संघातपूर्वक जगत्-उत्पत्तकी कल्पना करना सर्वथा युक्तिविरुद्ध है; अतः वैभाषिक और सौत्रान्तिकोंका मत माननेयोग्य नहीं है। सम्बन्ध— पूर्वपक्षीकी ओरसे दिये जानेवाले समाधानका स्वयं उल्लेख करके सूत्रकार उसका खण्डन करते हैं— इतरेतरप्रत्ययत्वादितिचेन्नोत्पत्तिमात्रनिमित्तत्वात्॥ २। २। १९॥ चेत्=यदि कहो; इतरेतरप्रत्ययत्वात्=अविद्या, संस्कार, विज्ञान आदिमेंसे