वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 184, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १४ ] अध्याय २ १८१ भिन्नताकी समानता है, इसलिये; अनवस्थितेः=उनमें अनवस्थादोषकी प्राप्ति हो जानेपर परमाणुओंके संयोगसे जगत्की उत्पत्ति नहीं हो सकेगी। व्याख्या—वैशेषिकोंकी मान्यताके अनुसार युतसिद्ध अर्थात् अलग- अलग रह सकनेवाली वस्तुओंमें परस्पर संयोग-सम्बन्ध होता है और अयुत- सिद्ध अर्थात् अलग-अलग न रहनेवाली वस्तुओंमें समवाय-सम्बन्ध होता है। रज्जु (रस्सी) और घट—ये युतसिद्ध वस्तुएँ हैं, अतः इनमें संयोग- सम्बन्ध ही स्थापित हो सकता है। तन्तु और वस्त्र—ये अयुतसिद्ध वस्तुएँ हैं, अतः इनमें सदा समवाय-सम्बन्ध रहता है। यद्यपि कारणसे कार्य अत्यन्त भिन्न है तो भी उनके मतमें समवायि कारण और कार्यका पारस्परिक सम्बन्ध 'समवाय' कहा गया है। इसके अनुसार दो अणुओंसे उत्पन्न होनेवाला 'द्व्यणुक' नामक कार्य उन अणुओंसे भिन्न होकर भी समवाय-सम्बन्धके द्वारा उनसे सम्बद्ध होता है, ऐसा मान लेनेपर, जैसे द्व्यणुक उन अणुओंसे भिन्न है, उसी प्रकार 'समवाय' भी समवायीसे भिन्न है। भेदकी दृष्टिसे दोनोंमें समानता है। अतः जैसे द्व्यणुक समवाय-सम्बन्धके द्वारा उन दो अणुओंसे सम्बद्ध माना गया है, उसी प्रकार समवाय भी अपने समवायीके साथ नूतन समवाय-सम्बन्धके द्वारा सम्बद्ध माना जा सकता है। इस प्रकार एकके बाद दूसरे समवाय-सम्बन्धकी कल्पना होती रहेगी और इस परम्पराका कहीं भी अन्त न होनेके कारण अनवस्था दोष प्राप्त होगा। अतः समवाय- सम्बन्ध सिद्ध न हो सकनेके कारण दो अणुओंसे द्व्यणुककी उत्पत्ति आदि क्रमसे जगत्की सृष्टि नहीं हो सकती। सम्बन्ध— यदि परमाणुओंमें सृष्टि और प्रलयके निमित्त क्रियाका होना स्वाभाविक मान लें तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं— नित्यमेव च भावात् ॥ २।२।१४॥ च=इसके सिवा (परमाणुओंमें प्रवृत्ति या निवृत्तिका कर्म स्वाभाविक माननेपर); नित्यम्=सदा; एव=ही; भावात्=सृष्टि या प्रलयकी सत्ता बनी रहेगी, इसलिये (परमाणुकारणवाद असंगत है)।