वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें१८० वेदान्त-दर्शन [ पाद २
व्याख्या— परमाणुवादियोंका कहना है कि 'सृष्टिके पूर्व परमाणु निश्चल रहते हैं, उनमें कर्म उत्पन्न होकर परमाणुओंका संयोग होता है और उससे जगत्की उत्पत्ति होती है।' इसपर सूत्रकार कहते हैं कि यदि उन परमाणुओंमें कर्मका संचार बिना किसी निमित्तके अपने-आप हो जाता है, ऐसा मानें तो यह असम्भव है; क्योंकि उनके मतानुसार प्रलयकालमें परमाणु निश्चल माने गये हैं। यदि ऐसा मानें कि जीवोंके अदृष्ट कर्मसंस्कारोंसे परमाणुओंमें कर्मका संचार हो जाता है तो यह भी सम्भव नहीं है; क्योंकि जीवोंका अदृष्ट तो उन्हींमें रहता है न कि परमाणुओंमें; अतः वह उनमें कर्मका संचार नहीं कर सकता। उक्त दोनों प्रकारसे ही परमाणुओंमें कर्म होना सिद्ध नहीं होता, इसलिये परमाणुओंके संयोगसे जगत्की उत्पत्ति नहीं हो सकती। इसके सिवा, अदृष्ट अचेतन है। कोई भी अचेतन वस्तु किसी चेतनका सहयोग प्राप्त किये बिना न तो स्वयं कर्म कर सकती है और न दूसरेसे ही करा सकती है। यदि कहें, जीवके शुभाशुभ कर्मसे ही अदृष्ट बनता है, अतः जीवात्माकी चेतनता उसके साथ है तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि सृष्टिके पहले जीवात्माकी चेतनता जाग्रत् नहीं है, अतः वह अचेतनके ही तुल्य है। इसके सिवा, जीवात्मामें ही अदृष्टकी स्थिति स्वीकार करनेपर वह परमाणुओंमें क्रियाशीलता उत्पन्न करनेमें निमित्त नहीं बन सकता; क्योंकि परमाणुओंसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकार किसी नियत निमित्तके न होनेसे परमाणुओंमें पहला कर्म नहीं उत्पन्न हो सकता। उस कर्म या क्रियाशीलताके बिना उनका परस्पर संयोग नहीं हो सकेगा। संयोग न होनेसे द्व्यणुक आदिकी उत्पत्तिके क्रमसे जगत्की सृष्टि और प्रलय भी न हो सकेंगे। सम्बन्ध— परमाणु कारणवादके खण्डनके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— समवायाभ्युपगमाच्च साम्यादनवस्थितेः ॥ २।२।१३॥ समवायाभ्युपगमात्=परमाणुवादमें समवाय-सम्बन्धको स्वीकार किया गया है, इसलिये; च=भी (परमाणुकारणवाद सिद्ध नहीं हो सकता); साम्यात्=क्योंकि कारण और कार्यकी भाँति समवाय और समवायीमें भी