भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 486 में से

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पृष्ठ 182

सूत्र १२ ] अध्याय २ १७९ क्रमसे पार्थिव परमाणुओँसे यह बड़ी भारी पृथिवी उत्पन्न होती है। मिट्टी और प्रस्तर आदि इसका स्वरूप है। यह अचल भावसे स्थित होती है। कारणके गुणोंसे ही कार्यके गुण उत्पन्न होते हैं। जैसे तन्तुओंके शुक्ल, नील, पीत आदि गुण ही वस्त्रमें वैसे गुण प्रकट करते हैं, इसी प्रकार परमाणुगत शुक्ल आदि गुणोंसे ही द्व्यणुकगत शुक्ल आदि गुण प्रकट होते हैं। द्व्यणुकके आरम्भक (उत्पादक) जो दो परमाणु हैं, उनकी वह द्वित्व संख्या द्व्यणुकमें अणुत्व और ह्रस्वत्व—इन दो परिमाणान्तरोंका आरम्भ (आविर्भाव) करती है। परंतु विभिन्न परमाणुमें जो पृथक्-पृथक् पारिमाण्डल्य नामक परिमाण होता है, वह द्व्यणुकमें दूसरे पारिमाण्डल्यको नहीं प्रकट करता है, क्योंकि वैसा करनेपर वह कार्य पहलेसे भी अत्यन्त सूक्ष्म होने लगेगा। इसी प्रकार संहारकालमें भी परमेश्वरकी इच्छासे परमाणुओमें कर्म प्रारम्भ होता है, इससे उनके पारस्परिक संयोगका नाश होता है, फिर द्व्यणुक आदिका नाश होते-होते पृथिवी आदिका भी नाश हो जाता है। वैशेषिकोंकी इस प्रक्रियाका सूत्रकार निराकरण करते हुए कहते हैं कि यदि कारणके ही गुण कार्यमें प्रकट होते हैं, तब तो परमाणुका गुण जो पारिमाण्डल्य (अत्यन्त सूक्ष्मता) है वही द्व्यणुकमें भी प्रकट होना उचित है; पर ऐसा नहीं होता। उनके ही कथनानुसार दो परमाणुओँसे ह्रस्वगुणविशिष्ट द्व्यणुककी उत्पत्ति होती है और ह्रस्व द्व्यणुकोंसे महत् दीर्घ परिमाणवाले त्र्यणुककी उत्पत्ति होती है। इस प्रकार जैसे वैशेषिकोंकी ऊपर बतायी हुई मान्यता असंगत है, उसी प्रकार उनके द्वारा कही जानेवाली अन्य बातें भी असंगत हैं। सम्बन्ध—इसी बातको स्पष्ट करते हैं— उभयथापि न कर्मातस्तदभावः ॥ २ । २ । १२ ॥ उभयथा=दोनों प्रकारसे; अपि=ही; कर्म=परमाणुओमें कर्म होना; न=नहीं सिद्ध होता; अतः=इसलिये; तदभावः=परमाणुओंके संयोगपूर्वक द्व्यणुक आदिकी उत्पत्तिके क्रमसे जगत्का जन्म आदि होना सम्भव नहीं है।