वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआवश्यकता नहीं है। साधक अपनी रुचिके अनुकूल किसी एक विद्याके अनुसार ही साधन कर सकता है। सम्बन्ध— जो सकाम उपासनाएँ अलग-अलग फलके लिये बतायी गयी हैं; उनका अनुष्ठान किस प्रकार करना चाहिये? इस जिज्ञासापर कहते हैं— काम्यास्तु यथाकामं समुच्चीयेरन्न वा पूर्व- हेत्वभावात् ॥ ३।३।६० ॥ काम्याः=सकाम उपासनाओंका अनुष्ठान; तु=तो; यथाकामम्=अपनी- अपनी कामनाके अनुसार; समुच्चीयेरन्=समुच्चय करके किया करें; वा=अथवा; न=समुच्चय न करके अलग-अलग करें; पूर्वहेत्वभावात्= क्योंकि इनमें पूर्वोक्त हेतु (फलकी समानता)-का अभाव है। व्याख्या—सकाम उपासनाओंमें सबका एक फल नहीं बताया गया है, भिन्न-भिन्न उपासनाका भिन्न-भिन्न फल कहा गया है, इस प्रकार पूर्वोक्त हेतु न होनेके कारण सकाम उपासनाका अनुष्ठान अधिकारी अपनी कामनाके अनुसार जिस प्रकार आवश्यक समझे, कर सकता है। जिन-जिन भोगोंकी कामना हो, उन-उनके लिये बतायी हुई सब उपासनाओंका समुच्चय करके भी कर सकता है और अलग-अलग भी कर सकता है, इसमें कोई अड़चन नहीं है। सम्बन्ध— अब उद्गीथ आदि अंगोंमें की जानेवाली उपासनाके विषयमें विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। पहले चार सूत्रोंद्वारा पूर्वपक्षकी उत्थापना की जाती है— अङ्गेषु यथाश्रयभावः ॥ ३।३।६१॥ अङ्गेषु=भिन्न-भिन्न अंगोंमें (की जानेवाली उपासनाओंका); यथाश्रय- भावः=यथाश्रयभाव है अर्थात् जो उपासना जिस अंगके आश्रित है, उस अंगके अनुसार ही उस उपासनाका भी भाव समझ लेना चाहिये।