भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 370, कुल 486 में से

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पृष्ठ 370

सूत्र ६२–६४] अध्याय ३ ३६७ व्याख्या—यज्ञकर्मके अंगभूत उद्गीथ आदिमें की जानेवाली जो उपासनाएँ हैं, जिनका दिग्दर्शन पचपनवें सूत्रमें किया गया है, उनमेंसे जो उपासना जिस अंगके आश्रित है, उस आश्रयके अनुसार ही उसकी व्यवस्था करनी चाहिये। इसलिये यही सिद्ध होता है कि जिन-जिन कर्मोंके अंगोंका समुच्चय हो सकता है, उन-उन अंगोंमें की जानेवाली उपासनाओंका भी उन कर्मोंके साथ समुच्चय हो सकता है। सम्बन्ध—इसके सिवा— शिष्टेश्च ॥ ३। ३। ६२ ॥ शिष्टेः = श्रुतिके शासन (विधान)-से; च = भी (यही सिद्ध होता है)। व्याख्या—जिस प्रकार उद्गीथ आदि स्तोत्रोंके समुच्चयका श्रुतिमें विधान है, उसी प्रकार उनके आश्रित उपासनाओंके समुच्चयका विधान भी उनके साथ ही हो जाता है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि कर्मोंके अंगोंके अनुसार उनके आश्रित रहनेवाली उपासनाओंका समुच्चय हो सकता है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी बातको दृढ़ करते हैं— समाहारात् ॥ ३ । ३ । ६३ ॥ समाहारात् = कर्मोंका समाहार बताया गया है, इसलिये उनके आश्रित उपासनाओंका भी समाहार (समुच्चय) उचित ही है। व्याख्या—उद्गीथ उपासनामें कहा है कि 'स्तोत्रगान करनेवाला पुरुष होताके कर्ममें जो स्तोत्रसम्बन्धी त्रुटि हो जाती है, उसका भी संशोधन कर लेता है' (छा० उ० १।५।५)। इस प्रकार प्रणव और उद्गीथकी एकता समझकर उद्गान करनेका महत्त्व दिखाया है। इस समाहारसे भी अंगाश्रित उपासनाका समुच्चय सूचित होता है। सम्बन्ध—पुनः उसी बातको दृढ़ करते हैं— गुणसाधारण्यश्रुतेश्च ॥ ३ । ३ । ६४ ॥ गुणसाधारण्यश्रुतेः=गुणोंकी साधारणता बतानेवाली श्रुतिसे; च=भी (यही बात सिद्ध होती है)।