भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 486 में से

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पृष्ठ 371

३६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या-उपासनाका गुण जो ॐकार है, उसका प्रयोग समान भावसे दिखाया है। जैसे कहा है कि 'उस (ॐ) अक्षरसे ही यह त्रयीविद्या (तीनों वेदोंसे सम्बन्ध रखनेवाली यज्ञादि कर्मसम्बन्धी विद्या) प्रवृत्त होती है, ॐ ऐसा कहकर ही आश्रावण कर्म करता है, ॐ ऐसा कहकर होता (कथन) करता है, ॐ ऐसा कहकर ही उद्गाता स्तोत्रगान करता है।' (छा० उ० १।१।९) इसी प्रकार कर्मांग-सम्बन्धी गुण जो कि उद्गीथ आदि हैं, उनका भी समान भावसे प्रयोग श्रुतिमें विहित है। इसलिये भी उपासनाओंका उनके आश्रयभूत कर्मांगोंके साथ समुच्चय होना उचित सिद्ध होता है। सम्बन्ध - इस प्रकार चार सूत्रोंद्वारा पूर्वपक्षकी उत्थापना करके अब दो सूत्रोंमें उसका उत्तर देकर इस पादकी समाप्ति की जाती है- न वा तत्सहभावाश्रुतेः ॥ ३।३।६५ ॥ वा = किंतु; तत्सहभावाश्रुतेः = उन-उन उपासनाओंका समुच्चय बतानेवाली श्रुति नहीं है, इसलिये; न= उपासनाओंका समुच्चय सिद्ध नहीं हो सकता। व्याख्या-उन-उन उपासनाओंके आश्रयभूत जो उद्गीथ आदि अंग हैं, उन अंगोंके समाहारकी भाँति उनके साथ उपासनाओंका समाहार बतानेवाली कोई श्रुति नहीं है, इसलिये यह सिद्ध नहीं हो सकता कि उन-उन आश्रयोंके समुच्चयकी भाँति ही उपासनाओंका भी समुच्चय होना चाहिये; क्योंकि उपासनाओंका उद्देश्य भिन्न है, जिस उद्देश्यसे जिस फलके लिये यज्ञादि कर्म किये जाते हैं, उनके अंगोंमें की जानेवाली उपासना उनसे भिन्न उद्देश्यसे की जाती है, अतः अंगोंके साथ उपासनाके समुच्चयका सम्बन्ध नहीं है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि उपासनाओंका समुच्चय नहीं बन सकता, उनका अनुष्ठान अलग-अलग ही करना चाहिये। सम्बन्ध - प्रकारान्तरसे इसी सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं-