भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 372, कुल 486 में से

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पृष्ठ 372

सूत्र ६६ ] अध्याय ३ ३६९ दर्शनाच्च ॥ ३ । ३ । ६६ ॥ दर्शनात् = श्रुतिमें उपासनाओंका समाहार न करना दिखाया गया है, इसलिये; च = भी (उनका समाहार सिद्ध नहीं हो सकता)। व्याख्या - श्रुतिमें कहा है कि 'पूर्वोक्त प्रकारसे रहस्यको जाननेवाला ब्रह्मा निःसंदेह यज्ञकी, यजमानकी और अन्य ऋत्विजोंकी रक्षा करता है।' (छा० उ० ४। १७ । १०) इस प्रकार श्रुतिमें विद्याकी महिमाका वर्णन करते हुए यह दिखाया गया है कि इन उपासनाओंका कर्मके साथ समुच्चय नहीं होता है; क्योंकि यदि उपासनाओंका सर्वत्र समाहार होता तो दूसरे ऋत्विक् भी उस तत्त्वके ज्ञाता होते और स्वयं ही अपनी रक्षा करते, ब्रह्माको उनकी रक्षा करनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती। इससे यही सिद्ध होता है कि उपासनाएँ उनके आश्रयभूत कर्मसम्बन्धी अंगोंके अधीन नहीं हैं, स्वतन्त्र हैं, अतएव समुच्चय न करके उनका अनुष्ठान अलग ही करना चाहिये। तीसरा पाद सम्पूर्ण