वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचौथा पाद सम्बन्ध—तीसरे पादमें परमात्माकी प्राप्तिके उपायभूत भिन्न-भिन्न विद्याओंके विषयमें प्रतीत होनेवाले विरोधको दूर किया गया तथा उन विद्याओंमेंसे किस विद्याके कौन-से गुण दूसरी विद्यामें ग्रहण किये जा सकते हैं, कौन-से नहीं किये जा सकते? इन विद्याओंका अलग-अलग अनुष्ठान करना उचित है या इनमेंसे कुछका समुच्चय भी किया जा सकता है? इत्यादि विषयोंपर विचार करके सिद्धान्तका प्रतिपादन किया गया। अब ब्रह्मज्ञान परमात्माकी प्राप्तिका स्वतन्त्र साधन है या नहीं? उसके अन्तरंग साधन कौन-से हैं और बहिरंग कौन-से हैं? इन सब बातोंपर विचार करके सिद्धान्तका प्रतिपादन करनेके लिये चौथा पाद आरम्भ किया जाता है। यहाँ पहले परमात्माकी प्राप्तिरूप पुरुषार्थकी सिद्धि केवल ज्ञानसे ही होती है या कर्मादिके समुच्चयसे? इसपर विचार आरम्भ करनेके लिये वेदव्यासजी अपना निश्चित मत बतलाते हैं— पुरुषार्थोऽतश्शब्दादिति बादरायणः ॥ ३। ४। १ ॥ पुरुषार्थः = परब्रह्मप्राप्तिरूप पुरुषार्थकी सिद्धि; अतः = इससे अर्थात् ब्रह्मज्ञानसे होती है; शब्दात् = क्योंकि शब्द (श्रुतिके वचन)-से यही सिद्ध होता है; इति = यह; बादरायणः = बादरायण कहते हैं। व्याख्या—वेदव्यासजी महाराज सबसे पहले अपना मत बतलाते हैं कि 'तरति शोकमात्मवित्'—'आत्मज्ञानी शोक-मोहसे तर जाता है' (छा० उ० ७। १। ३); 'तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥'—'ज्ञानी महात्मा नाम-रूपसे मुक्त होनेपर परात्पर ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है' (मु० उ० ३। २। ८); 'ब्रह्मविदाप्नोति परम्'—'ब्रह्मवेत्ता परमात्माको प्राप्त हो जाता है' (तै० उ० २। १), 'ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥'— 'परम देवको जानकर सब प्रकारके पाशों (बन्धनों)-से मुक्त हो जाता है' (श्वेता० उ० ५। १३)। इस प्रकार श्रुतिका कथन होनेसे यही सिद्ध होता है कि परमात्माकी प्राप्तिरूप परमपुरुषार्थकी सिद्धि इस ब्रह्मज्ञानसे ही होती है।