वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २-३ ] अध्याय ३ ३७१
सम्बन्ध - उपर्युक्त सिद्धान्तसे जैमिनि ऋषिका मतभेद दिखाते हुए कहते हैं- शेषत्वात्पुरुषार्थवादो यथान्येष्विति जैमिनिः॥ ३।४।२॥ शेषत्वात् = कर्मका अंग होनेके कारण; पुरुषार्थवादः = ब्रह्मविद्याको पुरुषार्थका हेतु बताना अर्थवादमात्र है; यथा = जिस प्रकार; अन्येषु = यज्ञके दूसरे अंगोंमें फलश्रुति अर्थवाद मानी जाती है; इति = यह; जैमिनिः = जैमिनि आचार्य कहते हैं। व्याख्या - आचार्य जैमिनि यह मानते हैं कि आत्मा कर्मका कर्ता होनेसे उसके स्वरूपका ज्ञान करानेवाली विद्या भी कर्मका अंग है; इसलिये उसे पुरुषार्थका साधन बताना उसकी प्रशंसा करना है। पुरुषार्थका साधन तो वास्तवमें कर्म ही है। जिस प्रकार कर्मके दूसरे अंगोंकी फलश्रुति उनकी प्रशंसामात्र समझी जाती है, वैसे ही इसे भी समझना चाहिये। सम्बन्ध - विद्या कर्मका अंग है, इस बातको सिद्ध करनेके लिये कारण बतलाते हैं- आचारदर्शनात्॥ ३।४।३॥ आचारदर्शनात् = श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार देखनेसे भी यही सिद्ध होता है कि विद्या कर्मोंका अंग है। व्याख्या - बृहदारण्यकोपनिषद्में यह प्रसंग आया है कि 'राजा जनकने एक समय बहुत दक्षिणावाला यज्ञ किया, उसमें कुरु तथा पांचालदेशके बहुत-से ब्राह्मण एकत्र हुए थे।' इत्यादि (बृह० उ० ३।१।१) छान्दोग्यमें वर्णन आया है कि राजा अश्वपतिने अपने पास ब्रह्मविद्या सीखनेके लिये आये हुए ऋषियोंसे कहा- 'आपलोग सुनें, मेरे राज्यमें न तो कोई चोर है, न कंजूस है, न मद्य पीनेवाला है, न अग्निहोत्र न करनेवाला है और न कोई विद्याहीन है। यहाँ कोई परस्त्रीगामी पुरुष ही नहीं है; फिर कुलटा स्त्री कैसे रह सकती है?* हे पूज्यगण! मैं अभी यज्ञ करनेवाला हूँ। एक-एक ऋत्विज्को जितना
- न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः। नानाहिताग्निर्नाविद्वान्न स्वैरी स्वैरिणी कुतः॥