वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ धन दूँगा, उतना ही आपलोगोंको भी दूँगा, आप यहीं ठहरिये।' (छा० उ० ५।११।५) महर्षि उद्दालक भी यज्ञकर्म करनेवाले थे, जिन्होंने अपने पुत्र श्वेतकेतुको ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया था (छा० उ० छठा अध्याय पूरा)। याज्ञवल्क्य भी जो ब्रह्मवादियोंमें सर्वश्रेष्ठ माने गये हैं, गृहस्थ और कर्म करनेवाले थे। इस प्रकार श्रुतिमें वर्णित श्रेष्ठ पुरुषोंका आचरण देखनेसे भी यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्या कर्मका ही अंग है और कर्मोंके सहित ही वह पुरुषार्थका साधन है। सम्बन्ध - इसी बातको श्रुतिप्रमाणसे दृढ़ करते हैं- तच्छ्रुतेः ॥ ३।४।४॥ तच्छ्रुतेः = तद्विषयक श्रुतिसे भी यही बात सिद्ध होती है। व्याख्या - श्रुतिका कथन है कि 'जो ॐकाररूप अक्षरके तत्त्वको जानता है और जो नहीं जानता, वे दोनों ही कर्म करते हैं; परंतु जो कर्म विद्या, श्रद्धा और योगसे युक्त होकर किया जाता है, वही प्रबलतर होता है।' (छा० उ० १।१।१०) इस प्रकार श्रुतिमें विद्याको कर्मका अंग बतलाया है। इससे भी यही सिद्ध होता है कि केवल ज्ञान पुरुषार्थका हेतु नहीं है। सम्बन्ध - पुनः इसी बातको दृढ़ करनेके लिये प्रमाण देते हैं- समन्वारम्भणात् ॥ ३।४।५॥ समन्वारम्भणात् = विद्या और कर्म दोनों जीवात्माके साथ जाते हैं, यह कथन होनेके कारण भी यही बात सिद्ध होती है। व्याख्या - जब आत्मा शरीरसे निकलकर जाता है, तब उसके साथ प्राण, अन्तःकरण और इन्द्रियाँ तो जाती ही हैं; विद्या और कर्म भी जाते हैं (बृह० उ० ४।४।२)। इस प्रकार विद्या और कर्म दोनोंके संस्कारोंको साथ लेकर जीवात्माका एक शरीरसे दूसरे शरीरमें गमन बताया जानेके कारण यह सिद्ध होता है कि विद्या कर्मका अंग ही है। सम्बन्ध - फिर दूसरे प्रमाणसे भी इसी बातको सिद्ध करते हैं-