भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 376

सूत्र ६-७ ] अध्याय ३ ३७३ तद्वतो विधानात् ॥ ३ । ४ । ६ ॥ तद्वतः = आत्मज्ञानयुक्त अधिकारीके लिये; विधानात् = कर्मोंका विधान होनेके कारण भी (यही सिद्ध होता है)। व्याख्या - श्रुतिने ब्रह्मविद्याकी परम्पराका वर्णन करते हुए कहा है कि 'उस ब्रह्मज्ञानका उपदेश ब्रह्माने प्रजापतिको दिया, प्रजापतिने मनुसे कहा, मनुने प्रजावर्गको सुनाया। ब्रह्मचारी नियमानुसार गुरुकी सेवा आदि कर्तव्य कर्मोंका भलीभाँति अनुष्ठान करते हुए वेदका अध्ययन समाप्त करे, फिर आचार्यकुलसे समावर्तन-संस्कारपूर्वक स्नातक बनकर लौटे और कुटुम्बमें रहता हुआ पवित्र स्थानमें स्वाध्याय करता रहे। पुत्र और शिष्यादिको धार्मिक बनाकर समस्त इन्द्रियोंको अपने अन्तःकरणमें स्थापित करे।' इन सब नियमोंको बताकर उनके फलका इस तरह वर्णन किया है-'इस प्रकार आचरण करनेवाला मनुष्य अन्तमें ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है।' (छा० उ० ८।१५।१) इस तरह विद्यापूर्वक कर्म करनेके विधानसे यह बात सिद्ध होती है कि विद्या कर्मका अंग है। सम्बन्ध - इतना ही नहीं, अपितु- नियमाच्च ॥ ३।४।७॥ नियमात् = श्रुतिमें नियमित किया जानेके कारण; च = भी (कर्म अवश्य कर्तव्य है, अतः विद्या कर्मका अंग है, यह सिद्ध होता है)। व्याख्या - श्रुतिका आदेश है कि 'मनुष्य शास्त्रविहित श्रेष्ठ कर्मोंका अनुष्ठान करते हुए ही इस जगत्में सौ वर्षोंतक जीवित रहनेकी इच्छा करे। इस प्रकार जीवनयात्राका निर्वाह करनेपर तुझ मनुष्यमें कर्म लिप्त नहीं होंगे। इसके सिवा दूसरे प्रकारका ऐसा कोई उपाय नहीं है, जिससे कर्म लिप्त न होवे।' (ईशा० २) इस प्रकार आजीवन कर्मानुष्ठानका नियम होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि केवल ज्ञान पुरुषार्थका हेतु नहीं है। सम्बन्ध - इस प्रकार जैमिनिके मतका वर्णन करके सूत्रकार अपने सिद्धान्तको सिद्ध करनेके लिये उत्तर देते हैं-