वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 208, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ४५ ] अध्याय २ २०५ विप्रतिषेधाच्च ॥ २ । २ । ४५ ॥ विप्रतिषेधात् = इस शास्त्रमें विशेषरूपसे जीवकी उत्पत्तिका निषेध किया गया है, इसलिये; च=भी (यह वेदके प्रतिकूल नहीं है)। व्याख्या—उक्त शास्त्रमें जीवको अनादि, नित्य, चेतन और अविनाशी माना गया है तथा उसके जन्म-मरणका निषेध किया गया है, इसलिये भी यह सिद्ध होता है कि इसका वैदिक प्रक्रियासे कोई विरोध नहीं है। इसमें जो यह कहा गया है कि 'शाण्डिल्य मुनिने अंगोंसहित चारों वेदोंमें निष्ठा (निश्चल स्थिति)-को न पाकर इस भक्तिशास्त्रका अध्ययन किया।' यह वेदोंकी निन्दा या प्रतिषेध नहीं है, जिससे कि इसे वेदविरोधी शास्त्र कहा जा सके। इस प्रसंगद्वारा भक्तिशास्त्रकी महिमाका ही प्रतिपादन किया गया है। छान्दोग्योपनिषद् (७। १। २-३)-में नारदजीके विषयमें भी ऐसा ही प्रसंग आया है। नारदजीने सनत्कुमारजीसे कहा है, 'मैंने समस्त वेद, वेदांग, इतिहास, पुराण आदि पढ़ लिये तो भी मुझे आत्मतत्त्वका अनुभव नहीं हुआ।' यह कथन जैसे वेदादि शास्त्रोंको तुच्छ बतानेके लिये नहीं, आत्मज्ञानकी महत्ता सूचित करनेके लिये है, उसी प्रकार पांचरात्रमें शाण्डिल्यका प्रसंग भी वेदोंकी तुच्छता बतानेके लिये नहीं, अपितु भक्तिशास्त्रकी महिमा प्रकट करनेके लिये आया है; अतः वह शास्त्र सर्वथा निर्दोष एवं वेदानुकूल है। दूसरा पाद सम्पूर्ण