वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 207, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें२०४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
विरोध है तथा कर्तासे करणकी उत्पत्ति नहीं हो सकती' इसके उत्तरमें सिद्धान्तपक्षका कहना है कि उक्त पांचरात्रशास्त्रमें जीवकी उत्पत्ति या कर्तासे करणकी उत्पत्ति नहीं बतायी गयी है, अपितु संकर्षण जीव- तत्त्वके, प्रद्युम्न मनस्तत्त्वके और अनिरुद्ध अहंकारतत्त्वके अधिष्ठाता बताये गये हैं, जो भगवान् वासुदेवके ही अंगभूत हैं; क्योंकि वहाँ संकर्षणको भगवान्का प्राण, प्रद्युम्नको मन और अनिरुद्धको अहंकार माना गया है। अतः वहाँ जो इनकी उत्पत्तिका वर्णन है, वह भगवान्के ही अंशोंका उन-उन रूपोंमें प्राकट्य बतानेवाला है। श्रुतिमें भी भगवान्के अजन्मा होते हुए भी विविधरूपोंमें प्रकट होनेका वर्णन इस प्रकार मिलता है—"अजायमानो बहुधा वि जायते।' (यजु० ३१।१९) इसलिये भगवान् वासुदेवका संकर्षण आदि व्यूहोंके रूपमें प्रकट होना वेदविरुद्ध नहीं है। जिस प्रकार भगवान् अपने भक्तोंपर दया करके श्रीराम आदिके रूपमें प्रकट होते हैं, उसी प्रकार साक्षात् परब्रह्म परमेश्वर भगवान् वासुदेव अपने भक्तजनोंपर कृपा करके स्वेच्छासे ही चतुर्व्यूहके रूपमें प्रकट होते हैं। भागवत-शास्त्रमें इन चारोंकी उपासना भगवान् वासुदेवकी ही उपासना मानी गयी है। भगवान् वासुदेव विभिन्न अधिकारियोंके लिये विभिन्न रूपोंमें उपास्य होते हैं, इसलिये उनके चार व्यूह माने गये हैं। इन व्यूहोंकी पूजा-उपासनासे परब्रह्म परमात्माकी ही प्राप्ति मानी गयी है। उन संकर्षण आदिका जन्म साधारण जीवोंकी भाँति नहीं है; क्योंकि वे चारों ही चेतन तथा ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज आदि समस्त भगवद्भावोंसे सम्पन्न माने गये हैं। अतः संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—ये तीनों उन परब्रह्म परमेश्वर भगवान् वासुदेवसे भिन्न तत्त्व नहीं हैं। अतः इनकी उत्पत्तिका वर्णन वेदविरुद्ध नहीं है। सम्बन्ध—यह पांचरात्र-आगम वेदानुकूल है, किसी अंशमें भी इसका वेदसे विरोध नहीं है; इस बातको पुनः दृढ़ करते हैं—