भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 486 में से

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सूत्र ४३-४४ ] अध्याय २ २०३ कभी नित्य नहीं हो सकती; अतः जीवकी उत्पत्ति असम्भव है। यदि जीवको उत्पत्ति-विनाशशील एवं अनित्य मान लिया जाय तो वेद- शास्त्रोंमें जो उसकी बद्ध-मुक्त अवस्थाका वर्णन है, वह व्यर्थ होगा। इसके सिवा, जन्म-मरणरूप बन्धनसे छूटने और परमात्माको प्राप्त करनेके लिये जो वेदोंमें साधन बताये गये हैं, वे सब भी व्यर्थ सिद्ध होते हैं। अतः जीवकी उत्पत्ति मानना उचित नहीं है। सम्बन्ध—अब पूर्वपक्षकी दूसरी शंकाका उल्लेख करते हैं— न च कर्तुः करणम् ॥ २।२।४३ ॥ च=तथा; कर्तुः=कर्ता (जीवात्मा)-से; करणम्=करण (मन और मनसे अहंकार)-की उत्पत्ति भी; न=सम्भव नहीं है। व्याख्या—जिस प्रकार परब्रह्म भगवान् वासुदेवसे जीवकी उत्पत्ति असम्भव है, उसी प्रकार संकर्षण नामसे कहे जानेवाले चेतन जीवात्मासे 'प्रद्युम्न' नामक मनस्तत्त्वकी और उससे 'अनिरुद्ध' नामक अहंकारतत्त्वकी उत्पत्ति भी सम्भव नहीं है; क्योंकि जीवात्मा कर्ता और चेतन है, मन करण है। अतः कर्तासे करणकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। सम्बन्ध—इस प्रकार पांचरात्र नामक भक्तिशास्त्रमें अन्य सब मान्यता वेदानुकूल होनेपर भी उपर्युक्त स्थलोंमें श्रुतिसे कुछ विरोध-सा प्रतीत होता है; उसे पूर्वपक्षके रूपमें उठाकर सूत्रकार अगले दो सूत्रोंद्वारा उस विरोधका परिहार करते हुए कहते हैं— विज्ञानादिभावे वा तदप्रतिषेधः ॥ २।२।४४॥ वा=निःसंदेह, विज्ञानादिभावे=(पांचरात्रशास्त्रद्वारा) भगवान्के विज्ञानादि षड्विध गुणोंका संकर्षण आदिमें भाव (होना) सूचित किया गया है। इस मान्यताके अनुसार उनका भगवत्स्वरूप होना सिद्ध होता है, इसलिये; तदप्रतिषेधः =उनकी उत्पत्तिका वेदमें निषेध नहीं है। व्याख्या—पूर्वपक्षीने जो यह कहा कि 'श्रुतिमें जीवात्माकी उत्पत्तिका

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