वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 209, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा पाद सम्बन्ध— इस शास्त्रमें जो ब्रह्मके लक्षण बताये गये हैं, उनमें स्मृति और न्यायसे जो विरोध प्रतीत होता है, उसका निर्णयपूर्वक समाधान तो इस अध्यायके पहले पादमें किया गया, उसके बाद दूसरे पादमें अपने सिद्धान्तकी सिद्धिके लिये अनीश्वरवादी नास्तिकोंके सिद्धान्तका तथा ईश्वरको मानते हुए भी उसको उपादान कारण न माननेवालोंके सिद्धान्तका युक्तियोंद्वारा निराकरण किया गया। साथ ही भागवतमतमें जो इस ग्रन्थके सिद्धान्तसे विरोध प्रतीत होता था, उसका समाधान करके उस पादकी समाप्ति की गयी। अब पूर्व प्रतिज्ञानुसार परब्रह्मको समस्त प्रपंचका अभिन्ननिमित्तोपादान कारण माननेमें जो श्रुतियोंके वाक्योंसे विरोध प्रतीत होता है, उसका समाधान करनेके लिये तथा जीवात्माके स्वरूपका निर्णय करनेके लिये तीसरा पाद आरम्भ किया जाता है— श्रुतियोंमें कहीं तो कहा है कि परमेश्वरने पहले-पहल तेजकी रचना की, उसके बाद तेजसे जल और जलसे अन्न—इस क्रमसे जगत्की रचना हुई। कहीं कहा कि पहले-पहल आकाशकी रचना हुई, उससे वायु आदिके क्रमसे जगत्की उत्पत्ति हुई। इस प्रकारके विकल्पोंकी एकता करके समाधान करनेके लिये पूर्वपक्षकी उत्थापना करते हैं— न वियदश्रुतेः॥ २।३।१॥ वियत्=आकाश; न=उत्पन्न नहीं होता; अश्रुतेः=क्योंकि (छान्दोग्योप- निषद्के सृष्टि-प्रकरणमें) उसकी उत्पत्ति नहीं सुनी गयी है। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्में जहाँ जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया है; वहाँ पहले-पहल तेजकी रचना बतायी गयी है।* फिर तेज, जल और अन्न— इन तीनोंके सम्मेलनसे जगत्की रचनाका वर्णन है (छा० उ० ६।२।१ से ६।३।४ तक), वहाँ आकाशकी उत्पत्तिका कोई प्रसंग नहीं है तथा
- 'तत्तेजोऽसृजत।' (छा० उ० ६।२।३)