भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 486 में से

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सूत्र २—४ ] अध्याय २ २०७ आकाशको विभु (व्यापक) माना गया है (गीता १३।३२)। इसलिये यह सिद्ध होता है कि आकाश नित्य है, वह उत्पन्न नहीं होता। सम्बन्ध—इस शंकाके उत्तरमें कहते हैं— अस्ति तु॥ २।३।२॥ तु=किंतु; अस्ति=आकाशकी उत्पत्तिका वर्णन भी (दूसरी श्रुतिमें) है। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्में 'ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त है' इस प्रकार ब्रह्मके लक्षण बताकर फिर उसी ब्रह्मसे आकाशकी उत्पत्ति बतायी गयी है;* इसलिये यह कहना ठीक नहीं कि वेदमें आकाशकी उत्पत्तिका वर्णन नहीं है। सम्बन्ध—उक्त विषयको स्पष्ट करनेके लिये पुनः पूर्वपक्षको उठाया जाता है— गौण्यसम्भवात् ॥ २।३।३॥ असम्भवात्=आकाशकी उत्पत्ति असम्भव होनेके कारण; गौणी=यह श्रुति गौणी है। व्याख्या—अवयवरहित और विभु होनेके कारण आकाशका उत्पन्न होना नहीं बन सकता, अतः तैत्तिरीयोपनिषद्में जो आकाशकी उत्पत्ति बतायी गयी है, उस कथनको गौण समझना चाहिये, वहाँ किसी दूसरे अभिप्रायसे आकाशकी उत्पत्ति कही गयी होगी। सम्बन्ध—पूर्वपक्षकी ओरसे अपने पक्षको दृढ़ करनेके लिये दूसरा हेतु दिया जाता है— शब्दाच्च ॥ २।३।४॥ शब्दात्=शब्दप्रमाणसे; च=भी (यह सिद्ध होता है कि आकाश उत्पन्न नहीं हो सकता)।

  • तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः। आकाशाद्वायुः। वायोरग्निः। अग्नेरापः। अद्भ्यः पृथिवी इत्यादि। (तै० उ० २।१।१)
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