वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—बृहदारण्यकमें कहा है कि ‘वायुश्चान्तरिक्षं चैतदमृतम्’— ‘वायु और अन्तरिक्ष—यह अमृत है’ (बृह० उ० २।३।३), अतः जो अमृत हो, उसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती; तथा यह भी कहा है कि ‘जिस प्रकार यह आकाश अनन्त है, उसी प्रकार आत्माको अनन्त समझना चाहिये।’ ‘आकाशशरीरं ब्रह्म’ ‘ब्रह्मका शरीर आकाश है’ (तै० उ० १। ६।२) इन श्रुति-वाक्योंसे आकाशकी अनन्तता सिद्ध होती है, इसलिये भी आकाशकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि उक्त श्रुतिमें जिस प्रकार आकाशकी उत्पत्ति बतानेवाले वाक्य हैं, उसी प्रकार वायु, अग्नि आदिकी उत्पत्ति बतानेवाले शब्द भी हैं; फिर यह कैसे माना जा सकता है कि आकाशके लिये तो कहना गौण है और दूसरोंके लिये मुख्य है, इसपर पूर्वपक्षकी ओरसे उत्तर दिया जाता है— स्याच्चैकस्य ब्रह्मशब्दवत्॥ २।३।५॥ च=तथा; ब्रह्मशब्दवत्=ब्रह्मशब्दकी भाँति; एकस्य=किसी एक शाखाके वर्णनमें; स्यात्=गौणरूपसे भी आकाशकी उत्पत्ति बतायी जा सकती है। व्याख्या—दूसरी जगह एक ही प्रकरणमें पहले तो कहा है कि ‘तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते।’—‘ब्रह्म विज्ञानमय तपसे वृद्धिको प्राप्त होता है, उससे अन्न उत्पन्न होता है।’ (मु० उ० १।१।८) उसके बाद कहा है कि— यः सर्वज्ञः सर्वविद् यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते॥ (मु० उ० १।१।९) अर्थात् ‘जो सर्वज्ञ, सबको जाननेवाला है, जिसका ज्ञानमय तप है, उससे यह ब्रह्म और नाम, रूप एवं अन्न उत्पन्न होता है।’ इस प्रकरणमें जैसे पहले ब्रह्म शब्द मुख्य अर्थमें प्रयुक्त हुआ है और पीछे उसी ब्रह्म शब्दका