वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 58, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ११] अध्याय १ ५५ गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् ॥ १।२।११॥ गुहाम् = हृदयरूप गुहामें; प्रविष्टौ = प्रविष्ट हुए दोनों; आत्मानौ = जीवात्मा और परमात्मा; हि = ही हैं; तद्दर्शनात् = क्योंकि (दूसरी श्रुतिमें भी) ऐसा ही देखा जाता है। व्याख्या-कठोपनिषद् (१।३।१)-में कहा है-'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे। छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥' अर्थात् 'शुभ कर्मोंके फलस्वरूप मनुष्य-शरीरके भीतर परब्रह्मके उत्तम निवास-स्थान (हृदयाकाश)-में बुद्धिरूप गुहामें छिपे हुए तथा 'सत्य' का पान करनेवाले दो हैं, वे दोनों छाया और धूपकी भाँति परस्पर विरुद्ध स्वभाववाले हैं। यह बात ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी कहते हैं। तथा जो तीन बार नाचिकेत अग्निका चयन करनेवाले पंचाग्नि-सम्पन्न गृहस्थ हैं, वे भी कहते हैं।' इस मन्त्रमें कहे हुए दोनों भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही हैं। उन्हींका वर्णन छाया और धूपके रूपमें हुआ है। परमात्मा सर्वज्ञ, पूर्ण ज्ञानस्वरूप एवं स्वप्रकाश है, अतः उसका धूपके नामसे वर्णन किया गया है और जीवात्मा अल्पज्ञ है। उसमें जो कुछ स्वल्प ज्ञान है, वह भी परमात्माका ही है। जैसे छायामें जो थोड़ा प्रकाश होता है, वह धूपका ही अंश होता है। इसलिये जीवात्माको छायाके नामसे कहा गया है। दूसरी श्रुतिमें भी जीवात्मा और परमात्माका एक साथ मनुष्य-शरीरमें प्रविष्ट होना इस प्रकार कहा है-'सेयं देवतैक्षत हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि' (छा० उ० ६।३।२) अर्थात् 'उस देवता (परमात्मा)- ने ईक्षण (संकल्प) किया कि मैं इस जीवात्माके सहित इन तेज आदि तीनों देवताओंमें अर्थात् इनके कार्यरूप शरीरमें प्रविष्ट होकर नाम और रूपको प्रकट करूँ।' इससे भी यही सिद्ध होता है कि उपर्युक्त कठोपनिषद्के मन्त्रमें कहे हुए छाया और धूप-सदृश दो भोक्ता जीवात्मा और परमात्मा ही हैं। यहाँ जो जीवात्माके साथ-साथ परमात्माको सत्य अर्थात् श्रेष्ठ