वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ अत्ता=भोजन करनेवाला अर्थात् प्रलयकालमें सबको अपनेमें विलीन करनेवाला (परब्रह्म परमेश्वर ही है)। व्याख्या—कठोपनिषद् (१।२।२५)-में कहा गया है कि 'यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः। मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः॥' अर्थात् (संहारकालमें) जिस परमेश्वरके ब्राह्मण और क्षत्रिय अर्थात् समस्त स्थावर-जंगम प्राणिमात्र भोजन बन जाते हैं तथा सबका संहार करनेवाला मृत्यु उपसेचन (व्यंजन—शाक आदि) बन जाता है, वह परमेश्वर जहाँ और जैसा है, यह कौन जान सकता है।' इस श्रुतिमें जिस भोक्ताका वर्णन है, वह कर्मफलरूप सुख-दुःख आदिका भोगनेवाला नहीं है। अपितु संहारकालमें मृत्युसहित समस्त चराचर जगत्को अपनेमें विलीन कर लेना ही यहाँ उसका भोक्तापन है। इसलिये परब्रह्म परमात्माको ही यहाँ अत्ता या भोक्ता कहा गया है, अन्य किसीको नहीं। सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— प्रकरणाच्च ॥ १।२।१०॥ प्रकरणात्=प्रकरणसे; च=भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—उपर्युक्त मन्त्रके पूर्व बीसवेंसे चौबीसवेंतक परब्रह्म परमेश्वरका ही प्रकरण है। उसीके स्वरूपका वर्णन करके उसे जाननेका महत्त्व तथा उसकी कृपाको ही उसे जाननेका उपाय बताया गया है। उक्त मन्त्रमें भी उस परमेश्वरको जानना अत्यन्त दुर्लभ बतलाया गया है, जो कि पहलेसे चले आते हुए प्रकरणके अनुरूप हैं। अतः पूर्वापरके प्रसंगको देखनेसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ परब्रह्म परमेश्वरको ही अत्ता (भोजन करनेवाला) कहा गया है। सम्बन्ध—अब यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि इसके बादवाली श्रुति (१।३।१)-में (कर्मफलरूप) 'ऋत' को पीनेवाले छाया और धूपके सदृश दो भोक्ताओंका वर्णन है। यदि परमात्मा कर्मफलका भोक्ता नहीं है तो उक्त दो भोक्ता कौन-कौन-से हैं? इसपर कहते हैं—