वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ८-९ ] अध्याय १ ५३ सम्बन्ध— परब्रह्म परमात्मा सबके हृदयमें स्थित होकर भी उनके सुख- दु:खसे अभिभूत नहीं होता; उसकी इस विशेषताको बतानेके लिये कहते हैं— सम्भोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात् ॥ १।२।८॥ चेत्=यदि कहो; सम्भोगप्राप्तिः=(सबके हृदयमें स्थित होनेसे चेतन होनेके कारण उसको) सुख-दुःखोंका भोग भी प्राप्त होता होगा; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; वैशेष्यात्=क्योंकि जीवात्माकी अपेक्षा उस परब्रह्ममें विशेषता है। व्याख्या—यदि कोई यह शंका करे कि आकाशकी भाँति सर्वव्यापक परमात्मा समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित होनेके कारण उन जीवोंके सुख- दुःखोंका भोग भी करता ही होगा; क्योंकि वह आकाशकी भाँति जड नहीं, चेतन है और चेतनमें सुख-दुःखकी अनुभूति स्वाभाविक है तो यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि परमात्मामें कर्तापनका अभिमान और भोक्तापन नहीं है। वह सबके हृदयमें रहता हुआ भी उनके गुण-दोषोंसे सर्वथा असंग है। यही जीवोंकी अपेक्षा उसमें विशेषता है। जीवात्मा तो अज्ञानके कारण कर्ता और भोक्ता है; किंतु परमात्मा सर्वथा निर्विकार है। वह केवलमात्र साक्षी है, भोक्ता नहीं (मु० उ० ३।१।१)*। इसलिये जीवोंके कर्मफलरूप सुख- दुःखादिसे उसका सम्बन्ध होना सम्भव नहीं है। सम्बन्ध— ऊपर कहे हुए प्रकरणमें यह सिद्ध किया गया कि सबके हृदयमें निवास करते हुए भी परब्रह्म भोक्ता नहीं है, परंतु वेदान्तमें कहीं-कहीं परमात्माको भोक्ता भी बताया गया है (क० उ० १।२।२५)। फिर यह वचन किसी अन्यके विषयमें है या उसका कोई दूसरा ही अर्थ है? यह निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं— अत्ता चराचरग्रहणात् ॥ १।२।९॥ चराचरग्रहणात्=चर और अचर सबको ग्रहण करनेके कारण यहाँ;
- तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥ (मु० उ० ३।१।१)