भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 486 में से

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सूत्र १३] अध्याय १ ५७ अन्तर उपपत्तेः ॥ १।२।१३ ॥ अन्तरे = जो नेत्रके भीतर दिखायी देनेवाला कहा गया है, वह ब्रह्म ही है; उपपत्तेः = क्योंकि ऐसा माननेसे ही पूर्वापर प्रसंगकी संगति बैठती है। व्याख्या - यह प्रसंग छान्दोग्योपनिषद्में चौथे अध्यायके दशम खण्डसे आरम्भ होकर पंद्रहवें खण्डमें समाप्त हुआ है। प्रसंग यह है कि उपकोसल नामका ब्रह्मचारी सत्यकाम नामक ऋषिके आश्रममें रहकर ब्रह्मचर्यका पालन करता हुआ गुरु और अग्नियोंकी सेवा करता था। सेवा करते-करते उसे बारह वर्ष व्यतीत हो गये, परंतु गुरुने उसे न तो उपदेश दिया और न स्नातक ही बनाया। इसके विपरीत उसीके साथ आश्रममें प्रविष्ट होनेवाले दूसरे शिष्योंको स्नातक बनाकर घर भेज दिया। तब आचार्यसे उनकी पत्नीने कहा - 'भगवन्! इस ब्रह्मचारीने अग्नियोंकी अच्छी प्रकार सेवा की है। तपस्या भी इसने की ही है। अब इसे उपदेश देनेकी कृपा करें।' परंतु अपनी भार्याकी बातको अनसुनी करके सत्यकाम ऋषि उपकोसलको उपदेश दिये बिना ही बाहर चले गये। तब मनमें दुःखी होकर उपकोसलने अनशन व्रत करनेका निश्चय कर लिया। यह देख आचार्य-पत्नीने पूछा - 'ब्रह्मचारी! तू भोजन क्यों नहीं करता है?' उसने कहा - 'मनुष्यके मनमें बहुत-सी कामनाएँ रहती हैं। मेरे मनमें बड़ा दुःख है, इसलिये मैं भोजन नहीं करूँगा।' तब अग्नियोंने एकत्र होकर विचार किया कि 'इसने हमारी अच्छी तरह सेवा की है, अतः उचित है कि हम इसे उपदेश करें।' ऐसा विचार करके अग्नियोंने कहा - 'प्राण ब्रह्म है, 'क' ब्रह्म है, 'ख' ब्रह्म है।' उपकोसल बोला - 'यह बात तो मैं जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है; परंतु 'क' और 'ख' को नहीं जानता।' अग्नियोंने कहा - 'यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कमिति प्राणं च' (छा० उ० ४। १०। ५) अर्थात् 'निस्संदेह जो 'क' है वही 'ख' है और जो 'ख' है वही 'क' है तथा प्राण भी वही है।' इस प्रकार उन्होंने ब्रह्मको 'क' सुख-स्वरूप और 'ख' आकाशकी भाँति सूक्ष्म एवं व्यापक

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