भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 330, कुल 486 में से

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पृष्ठ 330

सूत्र १५-१६ ] अध्याय ३ ३२७ साथ ही प्रत्येकका आत्मा एक ही तत्त्वको निश्चित किया गया। इससे यह मालूम होता है कि उत्तरोत्तर सूक्ष्म तत्त्वके भीतर दृष्टि ले जाकर उस एक ही अन्तरात्माको लक्ष्य कराया गया है। वहाँ विज्ञानमय जीवात्माका वर्णन करके उसका भी अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाया। अन्तमें सबका अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाकर तथा उसका अन्तरात्मा भी उसीको बतलाकर इस रूपककी परम्पराको समाप्त कर दिया गया। इससे यही सिद्ध होता है कि परब्रह्म परमेश्वरका भलीभाँति चिन्तन करनेके लिये उसके सूक्ष्म तत्त्वको समझाना ही इस रूपकका प्रयोजन है। सम्बन्ध— यहाँ आनन्दमय नामसे परमात्माको ही लक्ष्य कराया गया है, अन्य किसी तत्त्वको नहीं, यह निश्चय कैसे हो सकता है? इसपर कहते हैं— आत्मशब्दाच्च ॥ ३। ३। १५ ॥ आत्मशब्दात् = आत्मशब्दका प्रयोग होनेके कारण; च = भी (यह सिद्ध हो जाता है)। व्याख्या— ऊपर कहे हुए कारणके सिवा, इस प्रकरणमें बारम्बार सबका अन्तरात्मा बताते हुए अन्तमें विज्ञानमयका अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाया है; उसके बाद उसका अन्तरात्मा दूसरे किसीको नहीं बतलाया। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि यहाँ आनन्दमय शब्द ब्रह्मका ही वाचक है। सम्बन्ध— 'आत्मा' शब्दका प्रयोग तो अधिकतर प्रत्यगात्मा (जीवात्मा)- का ही वाचक होता है। फिर यह निश्चय कैसे हुआ कि यहाँ 'आत्मा' शब्द ब्रह्मका वाचक है? इसपर कहते हैं— आत्मगृहीतिरितरवदुत्तरात् ॥ ३। ३। १६ ॥ आत्मगृहीतिः = आत्म-शब्दसे परमात्माका ग्रहण; इतरवत् = दूसरी श्रुतिकी भाँति; उत्तरात् = उसके बादके वर्णनसे (सिद्ध होता है)। व्याख्या— जिस प्रकार 'आत्मा वा इदमेकमेवाग्र आसीन्नान्यत् किञ्चन मिषत् स ईक्षत लोकान्नु सृजै', (ऐ० उ० १।१) 'पहले यह एक आत्मा ही