वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ था, उसने इच्छा की कि मैं लोकोंकी रचना करूँ।' (ऐ० उ० १।१।१) इस श्रुतिमें प्रजाकी सृष्टिके प्रकरणको लेकर 'आत्मा' शब्दका प्रयोग हुआ है, इसलिये यहाँ 'आत्मा' शब्दको ब्रह्मका वाचक माना गया। उसी प्रकार तैत्तिरीय-श्रुतिमें भी आनन्दमयका वर्णन करनेके बाद तत्काल ही सोऽकामयत बहु स्याम्— 'उसने इच्छा की कि मैं बहुत हो जाऊँ।' इत्यादि वाक्योंद्वारा उस आनन्दमय आत्मासे समस्त जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया गया है। अतः बादमें आये हुए इस वर्णनसे ही यह सिद्ध हो जाता है कि यहाँ 'आत्मा' शब्द परमात्माका ही वाचक है और 'आनन्दमय' नाम भी यहाँ उस परब्रह्मका ही है। सम्बन्ध— ऊपर कही हुई बातमें पुनः शंका उपस्थित करके उसका उत्तर देते हुए पूर्वोक्त सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं— अन्वयादिति चेत्स्यादवधारणात् ॥ १ । १ । १७ ॥ चेत् = यदि कहो कि; अन्वयात् = प्रत्येक वाक्यमें आत्मशब्दका अन्वय होनेके कारण यह सिद्ध नहीं होता कि आनन्दमय ब्रह्म है; इति = तो इसका उत्तर यह है कि; अवधारणात् = निर्धारित किये जानेके कारण; स्यात् = (आनन्दमय ही ब्रह्म है) यह बात सिद्ध हो सकती है। व्याख्या— यदि कहो कि 'तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीमें 'आत्मा' शब्दका प्रयोग तो सभी वाक्योंके अन्तमें आया है, फिर केवल 'आत्मा' शब्दके प्रयोगसे 'आनन्दमय' को ही ब्रह्म कैसे मान लिया जाय ?' तो इसके उत्तरमें कहते हैं कि जिस 'आत्मा' शब्दकी सभी वाक्योंमें व्याप्ति है, वह ब्रह्मका वाचक नहीं है; अपितु अन्तमें जिसको निर्धारित कर दिया गया है, वह ब्रह्मका वाचक है। अन्नमय, प्राणमय आदि आत्माओंको ब्रह्मका शरीर और ब्रह्मको उनका अन्तरात्मा बतलानेके उद्देश्यसे वहाँ सबके साथ 'आत्मा' शब्दका प्रयोग किया गया है। इसीलिये अन्नमयका अन्तरात्मा उससे भिन्न प्राणमयको बतलाया; फिर प्राणमयका अन्तरात्मा उससे भिन्न मनोमयको बतलाया और मनोमयका अन्तरात्मा विज्ञानमयको तथा विज्ञानमयका भी