वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 332, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १८ ] अध्याय ३ ३२९ अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाया। उसके बाद आनन्दमयका अन्तरात्मा अन्य किसीको नहीं बतलाया और अन्तमें यह निर्धारित कर दिया कि इसका शरीरसम्बन्धी आत्मा यह स्वयं ही है, जो कि पहले कहे हुए अन्य सब पुरुषोंका भी आत्मा है। यह कहकर उसीसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया। इस प्रकार यहाँ आनन्दमयको पूर्णरूपसे परमात्मा निश्चित कर दिया गया है। इसीसे यह सिद्ध होता है कि आनन्दमय शब्द परमात्माका वाचक है। सम्बन्ध—‘‘इस प्रकरणमें आत्मासे आकाशादि भूतोंकी उत्पत्तिका वर्णन करनेके बाद पृथिवीसे ओषधि, ओषधिसे अन्न और अन्नसे पुरुषकी उत्पत्ति बतलायी; फिर कहा कि 'निश्चयपूर्वक वही यह पुरुष अन्नरसमय है। इस वर्णनके अनुसार 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस वाक्यद्वारा बतलाया हुआ ब्रह्म ही यहाँ अन्नरसमय पुरुष है या उससे भिन्न?'' इस जिज्ञासापर कहते हैं— कार्याख्यानादपूर्वम् ॥ ३।३।१८॥ कार्याख्यानात् = ब्रह्मका कार्य बतलाया जानेके कारण यह पुरुष; अपूर्वम् = वह पूर्वोक्त ब्रह्म नहीं हो सकता। व्याख्या—इस प्रकरणमें जिस अन्नरसमय पुरुषका वर्णन है, वह पूर्वोक्त परब्रह्म नहीं हो सकता, किंतु अन्नका परिणामभूत यह सजीव मनुष्य-शरीर ही यहाँ अन्नरसमय पुरुषके नामसे कहा गया है; क्योंकि इस पुरुषको उस पूर्वोक्त ब्रह्मका आकाशादिके क्रमसे कार्य बतलाया गया है और इसका अन्तरात्मा प्राणमय आदिके क्रमसे विज्ञानमय जीवात्माको बतलाया है तथा विज्ञानमयका आत्मा ब्रह्मको बतलाकर अन्तमें आनन्दके साथ उसकी एकता की गयी है। इसलिये जिनके 'सत्य', 'ज्ञान' और 'अनन्त' ये लक्षण बताये गये हैं तथा जो 'आत्मा' और 'आनन्दमय' नामसे जगत्का कारण बतलाया गया है, वह ब्रह्म इस अन्नरसमय पुरुषसे भिन्न सबका अन्तरात्मा है। सम्बन्ध—ग्यारहवें सूत्रसे 'आनन्द' के प्रकरणका विचार आरम्भ करके अठारहवें सूत्रतक उस प्रकरणको समाप्त कर दिया गया। अब