वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ पहले आरम्भ किये हुए प्रकरणपर दूसरी श्रुतियोंके विषयमें विचार आरम्भ किया जाता है— समान एवं चाभेदात् ॥ ३ । ३ । १९ ॥ समाने = एक शाखामें; च = भी; एवम् = इसी प्रकार विद्याकी एकता समझनी चाहिये; अभेदात् = क्योंकि दोनों जगह उपास्यमें कोई भेद नहीं है। व्याख्या—वाजसनेयी शाखाके शतपथ-ब्राह्मणमें 'सत्य ही ब्रह्म है इस प्रकार उपासना करनी चाहिये, निस्संदेह यह पुरुष संकल्पमय है। वह जितने संकल्पोंसे युक्त होकर इस लोकसे प्रयाण करता है, परलोकमें जानेपर वैसे ही संकल्पवाला होकर उत्पन्न होता है। वह मनोमय प्राण-शरीरवाले आकाश- स्वरूप आत्माकी उपासना करे।' इस प्रकार शाण्डिल्यविद्याका वर्णन किया गया है (श० ब्रा० १० । ६ । ३ । २)¹। उसी शाखाके बृहदारण्यकमें भी कहा है कि 'प्रकाश ही जिसका सत्य स्वरूप है वह पुरुष मनोमय है, वह धान और जौ आदिके सदृश सूक्ष्म परिमाणवाला है; वह उस हृदयाकाशमें स्थित है, वह सबका स्वामी और सबका अधिपति है तथा यह जो कुछ है, सभीका उत्तम शासन करता है।' (बृह० उ० ५ । ६ । १)² इन दोनों ग्रन्थोंमें कही हुई इन विद्याओंमें भेद है या अभेद ? यह संशय उपस्थित होनेपर सूत्रकार कहते हैं—जैसे भिन्न शाखाओंमें विद्याकी एकता और गुणोंका उपसंहार उचित माना गया है; उसी प्रकार एक शाखामें कही हुई विद्याओंमें भी एकता माननी चाहिये; क्योंकि वहाँ उपास्यमें भेद नहीं है। दोनों जगह एक ही ब्रह्म उपास्य बताया गया है। १-सत्यं ब्रह्मेत्युपासीत। अथ खलु क्रतुमयोऽयं पुरुषः सः यावत्क्रतुरयमस्माल्लोकात् प्रैति एवंक्रतुर्भूत्वामुं लोकं प्रेत्याभिसम्भवति स आत्मानमुपासीत मनोमयं प्राणशरीरं भारूपं सत्यसंकल्पमाकाशात्मानम्।' २-'मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा व्रीहिर्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च ॥' (बृह० उ० ५ । ६ । १)