वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—रूपकके लिये अवयवकी कल्पनासे युक्त जो प्रियशिरस्त्व आदि धर्म हैं, उनको छोड़कर दूसरे-दूसरे जो आनन्द आदि स्वरूपगत धर्म हैं, उनका संग्रह प्रत्येक ब्रह्मविद्याके प्रसंगमें किया जा सकता है; क्योंकि उनमें अर्थकी समानता है अर्थात् उन सबके द्वारा प्रतिपाद्य ब्रह्म एक ही है। सम्बन्ध—कठोपनिषद्में जो रथके रूपककी कल्पना करके इन्द्रिय आदिका घोड़े आदिके रूपमें वर्णन किया है, वहाँ तो इन्द्रिय आदिके संयमकी बात समझानेके लिये वैसा कहना सार्थक मालूम होता है, परंतु यहाँ तो पक्षीके रूपकका कोई विशेष प्रयोजन नहीं दीखता। अतः यहाँ इस रूपककी कल्पना किसलिये की गयी? इस जिज्ञासापर कहते हैं— आध्यानाय प्रयोजनाभावात् ॥ ३।३।१४॥ प्रयोजनाभावात् = अन्य किसी प्रकारका प्रयोजन न होनेके कारण (यही मालूम होता है कि); आध्यानाय = उस परमेश्वरका भलीभाँति चिन्तन करनेके लिये (उसका तत्त्व रूपकद्वारा समझाया गया है)। व्याख्या—इस रूपकका दूसरा कोई प्रयोजन दिखलायी नहीं देता, इसलिये यही समझना चाहिये कि पहले जिस परब्रह्म परमेश्वरका सत्य, ज्ञान और अनन्तके नामसे वर्णन करके उसको सबके हृदयमें स्थित बतलाया है और उसकी प्राप्तिके महत्त्वका वर्णन किया है (तै० उ० २।१)। उसको प्राप्त करनेका एकमात्र उपाय बारम्बार चिन्तन करना है, पर उसके स्वरूपकी कुछ जानकारी हुए बिना चिन्तन नहीं हो सकता; अतः वह किस प्रकार सबके हृदयमें व्याप्त है; यह बात समझानेके लिये यहाँ अन्नमय आदि कोशवाचक शब्दोंके द्वारा प्रकरण उठाया गया, क्योंकि किसी पेटीमें बन्द करके गुप्त रखे हुए रत्नकी भाँति वह परमेश्वर भी सबके हृदयमें बुद्धिरूप गुफाके भीतर छिपा है; यह तत्त्व समझाना है। वहाँ सबसे पहले जो यह अन्नमय स्थूल शरीर है, इसको पुरुषके नामसे कहकर उसके अंगोंकी पक्षीके अंगोंसे तुलना करके आगेका प्रकरण चलाया गया तथा क्रमशः एकका दूसरेको अन्तरात्मा बताते हुए प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय पुरुषका वर्णन किया गया।