भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 328, कुल 486 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 328

सूत्र १२-१३ ] अध्याय ३ ३२५ सम्बन्ध- "यदि ऐसी बात है, तब तो तैत्तिरीयोपनिषद्में जो आनन्दमय आत्माका प्रकरण प्रारम्भ करके कहा गया है कि 'प्रिय ही उसका सिर है, मोद दाहिना पंख है, प्रमोद बायाँ पंख है, आनन्द आत्मा है और ब्रह्म ही पुच्छ एवं प्रतिष्ठा है।' इसके अनुसार 'प्रियशिरस्त्व' आदि धर्मोंका भी सर्वत्र ब्रह्मविद्यामें संग्रह हो सकता है।" ऐसी आशंका होनेपर कहते हैं- प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिरुपचयापचयौ हि भेदे॥ ३। ३। १२॥ प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिः = 'प्रियशिरस्त्व'-'प्रियरूप सिरका होना' आदि धर्मोंकी प्राप्ति अन्यत्र ब्रह्मविद्याके प्रकरणमें नहीं होती है; हि=क्योंकि; भेदे = इस प्रकार सिर आदि अंगोंका भेद मान लेनेपर; उपचयापचयौ = ब्रह्ममें बढ़ने-घटनेका दोष उपस्थित होगा। व्याख्या-प्रिय उसका सिर है, मोद और प्रमोद पाँख हैं, इस प्रकार पक्षीका रूपक देकर जो अंगोंकी कल्पना की गयी है यह ब्रह्मका स्वरूपगत धर्म नहीं है; अतः इसका संग्रह दूसरी जगह ब्रह्मविद्याके प्रसंगमें करना उचित नहीं है; क्योंकि इस प्रकार अंग-प्रत्यंगके भेदसे ब्रह्ममें भेद मान लेनेपर उसमें बढ़ने-घटनेके दोषकी आशंका होगी; इसलिये जो ब्रह्मके स्वाभाविक लक्षण न हों, किसी रूपकके उद्देश्यसे कहे गये हों, उनको दूसरी जगह नहीं लेना चाहिये। सम्बन्ध-उसमें जो आनन्द और ब्रह्म शब्द आये हैं, उनको दूसरी जगह लेना चाहिये या नहीं? इस जिज्ञासापर कहते हैं- इतरे त्वर्थसामान्यात् ॥ ३। ३। १३॥ तु = किंतु; इतरे = दूसरे जो आनन्द आदि धर्म हैं, वे (ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करनेके लिये श्रुतिमें कहे गये हैं, इसलिये अन्यत्र ब्रह्मविद्याके प्रसंगमें उनका ग्रहण किया जा सकता है); अर्थसामान्यात् = क्योंकि उन सबमें अर्थकी समानता है।