भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 486 में से

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पृष्ठ 320

सूत्र २ ] अध्याय ३ ३१७ कहीं 'शब्दरहित, स्पर्शरहित, रूपरहित, रसरहित और गन्धरहित तथा अविनाशी, नित्य, अनादि, अनन्त (सीमारहित), सर्वश्रेष्ठ' (क० उ० १।३।१५) इस प्रकार समस्त प्राकृत जड और चेतन पदार्थोंसे भिन्न बताकर उसका लक्ष्य कराया गया है और अन्तमें कहा गया है कि इसे पाकर उपासक जन्म- मरणसे छूट जाता है। इन सभी वर्णनोंका उद्देश्य एकमात्र उस परब्रह्म परमेश्वरको लक्ष्य कराकर उसे प्राप्त करा देना है। सभी जगह प्रकारभेदसे उस परमात्माका ही चिन्तन करनेके लिये कहा गया है, अतः विधि और साध्यकी एकताके कारण साधनरूप विद्याओंमें वास्तविक भेद नहीं है, अधिकारीके भेदसे प्रकारभेद है। इसके सिवा, जो भिन्न शाखावालोंके द्वारा वर्णित एक ही प्रकारकी वैश्वानर आदि विद्याओंमें आंशिक भेद दिखलायी देता है, उससे भी विद्याओंमें भेद नहीं समझना चाहिये; क्योंकि उनमें सर्वत्र विधिवाक्य और फलकी एकता है, इसलिये उनमें कोई वास्तविक भेद नहीं है। सम्बन्ध — वर्णन-शैलीमें कुछ भेद होनेपर भी विद्यामें भेद नहीं मानना चाहिये; इसका प्रतिपादन करते हैं— भेदान्नेति चेन्नैकस्यामपि ॥ ३।३।२॥ चेत् = यदि ऐसा कहो कि; भेदात् = उन स्थलोंमें वर्णनका भेद है, इसलिये; न = एकता सिद्ध नहीं होती; इति न = तो यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि; एकस्याम् = एक विद्यामें; अपि = भी (इस प्रकार वर्णनका भेद होना अनुचित नहीं है)। व्याख्या — जगत्के कारणको ब्रह्म कहा गया है और वही उपास्य होना चाहिये; किंतु कहीं तो 'जगत्की उत्पत्तिके पूर्व एक सत् ही था, उसने इच्छा की कि मैं बहुत होऊँ, उसने तेजको उत्पन्न किया।' (छा० उ० ६।२।१, ३) इस प्रकार जगत्की उत्पत्ति सत्से बतायी है। कहीं 'पहले यह आत्मा ही था, दूसरा कोई भी चेष्टाशील नहीं था, उसने इच्छा की कि मैं लोकोंको रचूँ।'