भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 321, कुल 486 में से

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३१८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ (ऐ० उ० १।१) इस प्रकार जगत्की उत्पत्ति आत्मासे बतायी है, कहीं 'आनन्दमय' का वर्णन करनेके अनन्तर उसीसे सब जगत्की उत्पत्ति बतायी है, वहाँ किसी प्रकारके क्रमका वर्णन नहीं किया है (तै० उ० २।६-७)। कहीं आत्मासे आकाशादिके क्रमसे जगत्की उत्पत्ति बतायी है (तै० उ० २।१), कहीं रयि और प्राण—इन दोनोंके द्वारा जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया है (प्र० उ० १।४), तथा कहीं 'यह उस समय अप्रकट था; फिर प्रकट हुआ।' (बृह० उ० १।४।७) ऐसा कहकर अव्यक्तसे जगत्की उत्पत्ति बतायी है। इस तरह भिन्न-भिन्न कारणोंसे और भिन्न-भिन्न क्रमसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया गया है। इन सब वेदवाक्योंकी एकता नहीं हो सकती। इसी प्रकार दूसरे विषयमें भी समझना चाहिये। ऐसा यदि कोई कहे तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि यहाँ सभी श्रुतियोंका अभिप्राय जगत्की उत्पत्तिके पहले उसके कारणरूप एक परमेश्वरको बताना है, उसीको 'सत्' नामसे कहा गया है तथा उसीका 'आत्मा', 'आनन्दमय', 'प्रजापति' और 'अव्याकृत' नामसे भी वर्णन किया गया है। इस प्रकार एक ही तत्त्वका प्रतिपादन करनेवाली एक विद्यामें वर्णनका भेद होना अनुचित नहीं है, उद्देश्य और फल एक होनेके कारण उन सबकी एकता ही है। सम्बन्ध—"मुण्डकोपनिषद्में कहा है कि 'जिन्होंने शिरोव्रतका अर्थात् सिरपर जटा-धारणपूर्वक ब्रह्मचर्यव्रतका विधिपूर्वक पालन किया हो, उन्हींको इस ब्रह्मविद्याका उपदेश देना चाहिये।' (३।२।१०) किंतु दूसरी शाखावालोंने ऐसा नहीं कहा है; अतः इस आथर्वणशाखामें बतायी हुई ब्रह्मविद्याका अन्य शाखामें कही हुई ब्रह्मविद्यासे अवश्य भेद होना चाहिये।'" ऐसी शंका होनेपर कहते हैं— स्वाध्यायस्य तथात्वेन हि समाचारेऽधिकाराच्च सववच्च तन्नियमः ॥ ३।३।३॥ स्वाध्यायस्य = यह शिरोव्रतका पालन अध्ययनका अंग है; हि = क्योंकि;