भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 486 में से

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पृष्ठ 322

सूत्र ४ ] अध्याय ३ ३१९ समाचारे = आथर्वणशाखावालोंके परम्परागत शिष्टाचारमें; तथात्वेन = अध्ययनके अंगरूपसे ही उसका विधान है; च = तथा; अधिकारात् = उस व्रतका पालन करनेवालेका ही ब्रह्मविद्या-अध्ययनमें अधिकार होनेके कारण; च = भी; सववत् = 'सव' होमकी भाँति; तन्नियमः = वह शिरोव्रतवाला नियम आथर्वणशाखावालोंके लिये ही है। व्याख्या—आथर्वणशाखाके उपनिषद् (मु० उ० ३ । २ । १०)-में कहा गया है कि 'तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद् यैस्तु चीर्णम् ॥'— 'उन्हींको इस ब्रह्मविद्याका उपदेश करना चाहिये; जिन्होंने विधिपूर्वक शिरोव्रतका पालन किया है।' उक्त शाखावालोंके लिये जो शिरोव्रतके पालनका नियम किया गया है, वह विद्याके भेदके कारण नहीं; अपितु उन शाखावालोंके अध्ययन-विषयक परम्परागत आचारमें ही यह नियम चला आता है कि जो शिरोव्रतका पालन करता हो, उसीको उक्त ब्रह्मविद्याका उपदेश करना चाहिये। उसीका उसमें अधिकार है। जिसने शिरोव्रतका पालन नहीं किया, उसका उस ब्रह्मविद्याके अध्ययनमें अधिकार नहीं है। जिस प्रकार 'सव' होमका नियम उन्हींकी शाखावालोंके लिये है, वैसे ही इस शिरोव्रतके पालनका नियम भी उन्हींके लिये है। इस प्रकार यह नियम केवल अध्ययनाध्यापनके विषयमें ही होनेके कारण इससे ब्रह्मविद्याकी एकतामें किसी प्रकारका विरोध नहीं है। सम्बन्ध—सब उपनिषदोंमें एक परमात्माके स्वरूपको बतानेके लिये ही प्रकार-भेदसे ब्रह्मविद्याका वर्णन है, यह बात वेद प्रमाणसे भी सिद्ध करते हैं— दर्शयति च ॥ ३ । ३ । ४ ॥ दर्शयति च = श्रुति भी यही बात दिखाती है। व्याख्या—कठोपनिषद्में कहा है कि 'सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति'— 'समस्त वेद जिस परम प्राप्य परमेश्वरका प्रतिपादन करते हैं।' इत्यादि (क० उ० १ । २ । १५) इसी प्रकारका वर्णन अन्यान्य श्रुतियोंमें भी है। तथा श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान्‌ने भी कहा है कि 'वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः'