भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 486 में से

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पृष्ठ 323

३२० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ (१५। १५) 'सब वेदोंके द्वारा जाननेयोग्य मैं ही हूँ।' इस प्रकार श्रुति- स्मृतियोंके सभी वचनोंका एक ही उद्देश्य देखनेमें आता है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्या भिन्न-भिन्न नहीं है। सम्बन्ध—यदि यही बात है तो एक जगहके वर्णनमें दूसरी जगहकी अपेक्षा कुछ बातें अधिक बतायी गयी हैं और कहीं कुछ बातें कम हैं, ऐसी परिस्थितिमें विभिन्न प्रकरणोंके वर्णनकी एकता कैसे होगी। इस जिज्ञासापर कहते हैं— उपसंहारोऽर्थभेदाद्विधिशेषवत्समाने च ॥ ३।३।५॥ समाने=एक प्रकारकी विद्यामें; च=ही; अर्थाभेदात् =प्रयोजनमें भेद न होनेके कारण; उपसंहारः =एक जगह कहे हुए गुणोंका दूसरी जगह उपसंहार कर लेना; विधिशेषवत् =विधिशेषकी भाँति (उचित है)। व्याख्या—जिस प्रकार कर्मकाण्डमें प्रयोजनका भेद न होनेपर एक शाखामें बताये हुए यज्ञादिके विधिशेषरूप अग्निहोत्र आदि धर्मोंका दूसरी जगह भी उपसंहार (अध्याहार) कर लिया जाता है, उसी प्रकार विभिन्न प्रकरणोंमें आयी हुई ब्रह्मविद्याके वर्णनमें भी प्रयोजन-भेद न होनेके कारण एक जगह कही हुई अधिक बातोंका दूसरी जगह उपसंहार (अध्याहार) कर लेना चाहिये। सम्बन्ध—श्रुतिमें वर्णित जो ब्रह्मविद्याएँ हैं, उनमें कहीं शब्दभेदसे, कहीं नामभेदसे और कहीं प्रकरणके भेदसे भिन्नता प्रतीत होती है, अतः उनकी एकताका प्रतिपादन करनेके लिये सूत्रकार स्वयं शंका उठाकर उनका समाधान करते हैं— अन्यथात्वं शब्दादिति चेन्नाविशेषात् ॥ ३।३।६॥ चेत्=यदि ऐसा कहो कि; शब्दात्=कहे हुए शब्दसे; अन्यथात्वम् = दोनोंकी भिन्नता प्रतीत होती है, अतः एकता सिद्ध नहीं होती; इति न=तो ऐसी बात नहीं है; अविशेषात् =विधि और फल आदिमें भेद न होनेके कारण (दोनों विद्याओंमें समानता है)।