भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 324, कुल 486 में से

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पृष्ठ 324

सूत्र ६ ] अध्याय ३ ३२१ व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्के आठवें अध्यायमें दहरविद्या और प्राजापत्यविद्या—इस प्रकार दो ब्रह्मविद्याओंका वर्णन है। वे दोनों विद्याएँ परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिका मार्ग बतानेवाली हैं, इसलिये उनकी समानता मानी जाती है। इसपर पूर्वपक्षकी ओरसे शंका उठायी जाती है कि दोनों विद्याओंमें शब्दका अन्तर है अर्थात् दहरविद्याके प्रकरणमें तो यह कहा गया है कि 'मनुष्य-शरीररूप ब्रह्मपुरमें हृदयरूप घरके भीतर जो आन्तरिक आकाश है और उसके भीतर जो वस्तु है, उसका अनुसंधान करना चाहिये।' (छा० उ० ८।१।१) तथा प्राजापत्यविद्यामें 'अपहतपाप्मा' आदि विशेषणोंसे युक्त आत्माको जाननेके योग्य बताया गया है (८।७।१)। इस प्रकार दोनों विद्याओंके वर्णनमें शब्दका भेद है, इसलिये वे दोनों एक नहीं हो सकतीं। इसके उत्तरमें सूत्रकार कहते हैं कि ऐसी बात नहीं है, क्योंकि दहरविद्यामें उस अन्तराकाशको ब्रह्मलोक, आत्मा और सबको धारण करनेवाला कहा गया है तथा उसे सब पापों और सब विकारोंसे रहित तथा सत्यसंकल्प आदि समस्त दिव्य गुणोंसे सम्पन्न बताकर (छा० उ० ८।१।५) उसी जाननेयोग्य तत्त्वको (छा० उ० ८।१।६) परब्रह्म निश्चित किया गया है, उसी प्रकार प्राजापत्यविद्यामें भी उस जाननेयोग्य तत्त्वको आत्मा नामसे कहकर उसे समस्त पापों और विकारोंसे रहित तथा सत्यसंकल्पत्व, सत्यकामत्व आदि दिव्य गुणोंसे युक्त परब्रह्म निश्चित किया गया है। दहरविद्यामें दहर आकाशको ही उपास्य बताया गया है, न कि उसके अन्तर्वर्ती लोकोंको। वहाँ प्रकारान्तरसे उस ब्रह्मको सबका आधार बतानेके लिये पहले उसके भीतरकी वस्तुओंको खोजनेके लिये कहा गया है। इस प्रकार वास्तवमें कोई भेद न होनेके कारण दोनों विद्याओंकी एकता है। इसी प्रकार दूसरी विद्याओंमें भी समानता समझ लेनी चाहिये। सम्बन्ध— पूर्वोक्त विद्याओंकी एकता सिद्ध करनेके लिये दूसरी असमान विद्याओंसे उनकी विशेषताका प्रतिपादन करते हैं—

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