भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 486 में से

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पृष्ठ 325

३२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ न वा प्रकरणभेदात्परोऽवरीयस्त्वादिवत्॥ ३। ३। ७॥ वा=अथवा; परोऽवरीयस्त्वादिवत्=परम उत्कृष्टता-अपकृष्टता आदि गुणोंसे युक्त दूसरी विद्याओंकी भाँति; प्रकरणभेदात्=प्रकरणके भेदसे उक्त दोनों विद्याएँ भिन्न; न=सिद्ध नहीं हो सकतीं। व्याख्या—छान्दोग्य और बृहदारण्यकोपनिषद्में उद्गीथविद्याका प्रकरण आता है, किंतु छान्दोग्यमें जो उद्गीथविद्या है वह अत्यन्त श्रेष्ठ है; क्योंकि वहाँ उद्गीथकी 'ॐकार' अक्षरके साथ एकता करके उसका महत्त्व बढ़ाया गया है (छा० उ० १। १ पूरा खण्ड), इसलिये उसका फल भी अत्यन्त श्रेष्ठ बताया गया है (छा० उ० १।९।१ से ४ तक), किंतु बृहदारण्यककी उद्गीथविद्या केवल प्राणोंका श्रेष्ठत्व सम्पादन करनेके लिये तथा यज्ञादिमें उद्गीथगानके समय स्वरकी विशेषता दिखानेके लिये है (बृह० उ० १। ३। १ से २७ तक)। इसलिये उसका फल भी वैसा नहीं बताया गया है। दोनों प्रकरणोंमें केवल देवासुर-संग्रामविषयक समानता है, पर उसमें भी उपासनाके प्रकारका भेद है; अतः किंचिन्मात्र समानताके कारण दोनोंकी समानता नहीं हो सकती। समानताके लिये उद्देश्य, विधेय और फलकी एकता चाहिये, वह उन प्रकरणोंमें नहीं है। इसलिये उनमें भेद होना उचित है; किंतु ऊपर कही हुई दहरविद्या और प्राजापत्यविद्यामें ऐसी बात नहीं है, केवल वर्णनका भेद है। अतः वर्णनमात्रका भेद होनेके कारण उत्तम और मध्यम आदिके भेदसे युक्त उद्गीथविद्याकी भाँति ऊपर कही हुई दहरविद्या और प्राजापत्यविद्यामें भेद सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि दोनोंके उद्देश्य, विधेय और फलमें भेद नहीं है। सम्बन्ध—अब दूसरे प्रकारकी शंकाका उत्तर देकर दोनों विद्याओंकी एकता सिद्ध करते हैं— संज्ञातश्चेत्तदुक्तमस्ति तु तदपि ॥ ३ । ३ । ८ ॥ चेत्=यदि कहो कि; संज्ञातः=संज्ञासे परस्पर-भेद होनेके कारण (एकता