वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
न वा प्रकरणभेदात्परोऽवरीयस्त्वादिवत्॥ ३। ३। ७॥
३२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ न वा प्रकरणभेदात्परोऽवरीयस्त्वादिवत्॥ ३। ३। ७॥ वा=अथवा; परोऽवरीयस्त्वादिवत्=परम उत्कृष्टता-अपकृष्टता आदि गुणोंसे युक्त दूसरी विद्याओंकी भाँति; प्रकरणभेदात्=प्रकरणके भेदसे उक्त दोनों विद्याएँ भिन्न; न=सिद्ध नहीं हो सकतीं। व्याख्या—छान्दोग्य और बृहदारण्यकोपनिषद्में उद्गीथविद्याका प्रकरण आता है, किंतु छान्दोग्यमें जो उद्गीथविद्या है वह अत्यन्त श्रेष्ठ है; क्योंकि वहाँ उद्गीथकी 'ॐकार' अक्षरके साथ एकता करके उसका महत्त्व बढ़ाया गया है (छा० उ० १। १ पूरा खण्ड), इसलिये उसका फल भी अत्यन्त श्रेष्ठ बताया गया है (छा० उ० १।९।१ से ४ तक), किंतु बृहदारण्यककी उद्गीथविद्या केवल प्राणोंका श्रेष्ठत्व सम्पादन करनेके लिये तथा यज्ञादिमें उद्गीथगानके समय स्वरकी विशेषता दिखानेके लिये है (बृह० उ० १। ३। १ से २७ तक)। इसलिये उसका फल भी वैसा नहीं बताया गया है। दोनों प्रकरणोंमें केवल देवासुर-संग्रामविषयक समानता है, पर उसमें भी उपासनाके प्रकारका भेद है; अतः किंचिन्मात्र समानताके कारण दोनोंकी समानता नहीं हो सकती। समानताके लिये उद्देश्य, विधेय और फलकी एकता चाहिये, वह उन प्रकरणोंमें नहीं है। इसलिये उनमें भेद होना उचित है; किंतु ऊपर कही हुई दहरविद्या और प्राजापत्यविद्यामें ऐसी बात नहीं है, केवल वर्णनका भेद है। अतः वर्णनमात्रका भेद होनेके कारण उत्तम और मध्यम आदिके भेदसे युक्त उद्गीथविद्याकी भाँति ऊपर कही हुई दहरविद्या और प्राजापत्यविद्यामें भेद सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि दोनोंके उद्देश्य, विधेय और फलमें भेद नहीं है। सम्बन्ध—अब दूसरे प्रकारकी शंकाका उत्तर देकर दोनों विद्याओंकी एकता सिद्ध करते हैं— संज्ञातश्चेत्तदुक्तमस्ति तु तदपि ॥ ३ । ३ । ८ ॥ चेत्=यदि कहो कि; संज्ञातः=संज्ञासे परस्पर-भेद होनेके कारण (एकता
सूत्र ९ ] अध्याय ३ ३२३
सूत्र ९ ] अध्याय ३ ३२३ सिद्ध नहीं हो सकती) तो; तदुक्तम् = उसका उत्तर (सूत्र ३।३।१ में) दे चुके हैं; तु = तथा; तदपि = वह (संज्ञाभेदके कारण होनेवाली विद्याविषयक विषमता) भी; अस्ति = अन्यत्र है। व्याख्या — यदि कहो कि उसमें संज्ञाका अर्थात् नामका भेद है; उस विद्याका नाम दहरविद्या है और दूसरीका नाम प्राजापत्यविद्या है; इसलिये दोनोंकी एकता नहीं हो सकती तो इसका उत्तर हम पहले सूत्र (३।३।१)-में ही दे चुके हैं। वहाँ बता आये हैं कि समस्त उपनिषदोंमें भिन्न-भिन्न नामोंसे जिन ब्रह्मविद्याओंका वर्णन है, उन सबमें विधिवाक्य, फल और उद्देश्य-विधेय आदिकी एकता होनेसे सब ब्रह्मविद्याओंकी एकता है। इसलिये यहाँ संज्ञाभेदसे कोई विरोध नहीं है। इसके सिवा, जिनमें उद्देश्य-विधेय और फल आदिकी समानता नहीं है, उन विद्याओंमें संज्ञा आदिके कारण भेद होता है और वैसी विद्याओंका वर्णन भी उपनिषदोंमें है ही (छा० उ० ३।१८।१ तथा ३।१९।१)। सम्बन्ध — नामका भेद होनेपर भी विद्यामें एकता हो सकती है, इस बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा कारण बतलाते हैं— व्याप्तेश्च समंजसम् ॥ ३।३।९ ॥ व्याप्तेः = ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है, इस कारण; च = भी; समंजसम् = ब्रह्म- विद्याओंमें समानता है। व्याख्या — परब्रह्म परमात्मा सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ है, इसलिये ब्रह्मविषयक विद्याके भिन्न-भिन्न नाम और प्रकरण होनेपर भी उनकी एकता होना उचित है, क्योंकि उन ब्रह्मविषयक सभी विद्याओंका उद्देश्य एकमात्र परब्रह्म परमात्माके ही स्वरूपका नाना प्रकारसे प्रतिपादन करना है। सम्बन्ध — अब यह जिज्ञासा होती है कि विद्याओंकी एकता और भिन्नताका निर्णय करनेके लिये प्रकरण, संज्ञा और वर्णनकी एकता और भेदकी अपेक्षा है या नहीं? इसपर कहते हैं—
३२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
३२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सर्वाभेदादन्यत्रेमे ॥ ३। ३। १० ॥ सर्वाभेदात् = सर्वस्वरूप परब्रह्मसम्बन्धी विद्यासे; अन्यत्र = दूसरी विद्याके सम्बन्धसे; इमे = इन पूर्व सूत्रोंमें कहे हुए सभी हेतुओंका उपयोग है। व्याख्या—परब्रह्म परमात्मा सबसे अभिन्न सर्वस्वरूप हैं। अतः उनके तत्त्वका प्रतिपादन करनेवाली विद्याओंमें भी भेद नहीं है। अतः संज्ञा, प्रकरण और शब्दसे इनकी भिन्नता सिद्ध नहीं की जा सकती; क्योंकि ब्रह्मकी सभी संज्ञाएँ हो सकती हैं। प्रत्येक प्रकरणमें उसकी बात आ सकती है तथा उसका वर्णन भी भिन्न-भिन्न सभी शब्दोंद्वारा किया जा सकता है। किंतु ब्रह्मविद्याके अतिरिक्त जो दूसरी विद्याएँ हैं, जिनका उद्देश्य ब्रह्मका प्रतिपादन करना नहीं है; उनकी एक-दूसरीसे भिन्नता या अभिन्नताको समझनेके लिये पहले कहे हुए प्रकरण, संज्ञा और शब्द—इन तीनों हेतुओंका उपयोग किया जा सकता है। सम्बन्ध—श्रुतिमें एक जगह ब्रह्मविद्याके प्रकरणमें ब्रह्मके जो आनन्द, सर्वज्ञता, सर्वकामता, सत्यसंकल्पत्व, सर्वेश्वरत्व तथा सर्वशक्तिमत्ता आदि धर्म बताये गये हैं, उनका उपसंहार (संग्रह) दूसरी जगह ब्रह्मके वर्णनमें किया जा सकता है। यह बात पहले सूत्र (३। ३। ५)-में कही गयी, अतः यह जिज्ञासा होती है कि तैत्तिरीयोपनिषद्में आनन्दमय पुरुषके वर्णनमें पक्षीके रूपकमें जिन शब्दोंका वर्णन आता है क्या उनका भी सर्वत्र उपसंहार किया जा सकता है? इसपर कहते हैं— आनन्दादयः प्रधानस्य ॥ ३। ३। ११॥ आनन्दादयः = आनन्द आदि; प्रधानस्य = सर्वश्रेष्ठ परब्रह्म परमात्माके धर्म हैं (उन सबका अन्यत्र भी ब्रह्मके वर्णनमें अध्याहार किया जा सकता है)। व्याख्या—आनन्द, सर्वगतत्व, सर्वात्मत्व तथा सर्वज्ञता आदि जितने भी परब्रह्म परमात्माके धर्म हैं, वे यदि श्रुतिमें एक जगह ब्रह्मके वर्णनमें आये हैं तो दूसरी जगह भी ब्रह्मके वर्णनमें उनका उपसंहार किया जा सकता है अर्थात् एक जगहके वर्णनमें जो धर्म या दिव्य गुण-सूचक विशेषण छूट गये हैं, उनकी पूर्ति अन्यत्रके वर्णनसे कर लेनी चाहिये।
सूत्र १२-१३ ] अध्याय ३ ३२५
सूत्र १२-१३ ] अध्याय ३ ३२५ सम्बन्ध- "यदि ऐसी बात है, तब तो तैत्तिरीयोपनिषद्में जो आनन्दमय आत्माका प्रकरण प्रारम्भ करके कहा गया है कि 'प्रिय ही उसका सिर है, मोद दाहिना पंख है, प्रमोद बायाँ पंख है, आनन्द आत्मा है और ब्रह्म ही पुच्छ एवं प्रतिष्ठा है।' इसके अनुसार 'प्रियशिरस्त्व' आदि धर्मोंका भी सर्वत्र ब्रह्मविद्यामें संग्रह हो सकता है।" ऐसी आशंका होनेपर कहते हैं- प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिरुपचयापचयौ हि भेदे॥ ३। ३। १२॥ प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिः = 'प्रियशिरस्त्व'-'प्रियरूप सिरका होना' आदि धर्मोंकी प्राप्ति अन्यत्र ब्रह्मविद्याके प्रकरणमें नहीं होती है; हि=क्योंकि; भेदे = इस प्रकार सिर आदि अंगोंका भेद मान लेनेपर; उपचयापचयौ = ब्रह्ममें बढ़ने-घटनेका दोष उपस्थित होगा। व्याख्या-प्रिय उसका सिर है, मोद और प्रमोद पाँख हैं, इस प्रकार पक्षीका रूपक देकर जो अंगोंकी कल्पना की गयी है यह ब्रह्मका स्वरूपगत धर्म नहीं है; अतः इसका संग्रह दूसरी जगह ब्रह्मविद्याके प्रसंगमें करना उचित नहीं है; क्योंकि इस प्रकार अंग-प्रत्यंगके भेदसे ब्रह्ममें भेद मान लेनेपर उसमें बढ़ने-घटनेके दोषकी आशंका होगी; इसलिये जो ब्रह्मके स्वाभाविक लक्षण न हों, किसी रूपकके उद्देश्यसे कहे गये हों, उनको दूसरी जगह नहीं लेना चाहिये। सम्बन्ध-उसमें जो आनन्द और ब्रह्म शब्द आये हैं, उनको दूसरी जगह लेना चाहिये या नहीं? इस जिज्ञासापर कहते हैं- इतरे त्वर्थसामान्यात् ॥ ३। ३। १३॥ तु = किंतु; इतरे = दूसरे जो आनन्द आदि धर्म हैं, वे (ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करनेके लिये श्रुतिमें कहे गये हैं, इसलिये अन्यत्र ब्रह्मविद्याके प्रसंगमें उनका ग्रहण किया जा सकता है); अर्थसामान्यात् = क्योंकि उन सबमें अर्थकी समानता है।
३२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
३२६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—रूपकके लिये अवयवकी कल्पनासे युक्त जो प्रियशिरस्त्व आदि धर्म हैं, उनको छोड़कर दूसरे-दूसरे जो आनन्द आदि स्वरूपगत धर्म हैं, उनका संग्रह प्रत्येक ब्रह्मविद्याके प्रसंगमें किया जा सकता है; क्योंकि उनमें अर्थकी समानता है अर्थात् उन सबके द्वारा प्रतिपाद्य ब्रह्म एक ही है। सम्बन्ध—कठोपनिषद्में जो रथके रूपककी कल्पना करके इन्द्रिय आदिका घोड़े आदिके रूपमें वर्णन किया है, वहाँ तो इन्द्रिय आदिके संयमकी बात समझानेके लिये वैसा कहना सार्थक मालूम होता है, परंतु यहाँ तो पक्षीके रूपकका कोई विशेष प्रयोजन नहीं दीखता। अतः यहाँ इस रूपककी कल्पना किसलिये की गयी? इस जिज्ञासापर कहते हैं— आध्यानाय प्रयोजनाभावात् ॥ ३।३।१४॥ प्रयोजनाभावात् = अन्य किसी प्रकारका प्रयोजन न होनेके कारण (यही मालूम होता है कि); आध्यानाय = उस परमेश्वरका भलीभाँति चिन्तन करनेके लिये (उसका तत्त्व रूपकद्वारा समझाया गया है)। व्याख्या—इस रूपकका दूसरा कोई प्रयोजन दिखलायी नहीं देता, इसलिये यही समझना चाहिये कि पहले जिस परब्रह्म परमेश्वरका सत्य, ज्ञान और अनन्तके नामसे वर्णन करके उसको सबके हृदयमें स्थित बतलाया है और उसकी प्राप्तिके महत्त्वका वर्णन किया है (तै० उ० २।१)। उसको प्राप्त करनेका एकमात्र उपाय बारम्बार चिन्तन करना है, पर उसके स्वरूपकी कुछ जानकारी हुए बिना चिन्तन नहीं हो सकता; अतः वह किस प्रकार सबके हृदयमें व्याप्त है; यह बात समझानेके लिये यहाँ अन्नमय आदि कोशवाचक शब्दोंके द्वारा प्रकरण उठाया गया, क्योंकि किसी पेटीमें बन्द करके गुप्त रखे हुए रत्नकी भाँति वह परमेश्वर भी सबके हृदयमें बुद्धिरूप गुफाके भीतर छिपा है; यह तत्त्व समझाना है। वहाँ सबसे पहले जो यह अन्नमय स्थूल शरीर है, इसको पुरुषके नामसे कहकर उसके अंगोंकी पक्षीके अंगोंसे तुलना करके आगेका प्रकरण चलाया गया तथा क्रमशः एकका दूसरेको अन्तरात्मा बताते हुए प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय पुरुषका वर्णन किया गया।
सूत्र १५-१६ ] अध्याय ३ ३२७
सूत्र १५-१६ ] अध्याय ३ ३२७ साथ ही प्रत्येकका आत्मा एक ही तत्त्वको निश्चित किया गया। इससे यह मालूम होता है कि उत्तरोत्तर सूक्ष्म तत्त्वके भीतर दृष्टि ले जाकर उस एक ही अन्तरात्माको लक्ष्य कराया गया है। वहाँ विज्ञानमय जीवात्माका वर्णन करके उसका भी अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाया। अन्तमें सबका अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाकर तथा उसका अन्तरात्मा भी उसीको बतलाकर इस रूपककी परम्पराको समाप्त कर दिया गया। इससे यही सिद्ध होता है कि परब्रह्म परमेश्वरका भलीभाँति चिन्तन करनेके लिये उसके सूक्ष्म तत्त्वको समझाना ही इस रूपकका प्रयोजन है। सम्बन्ध— यहाँ आनन्दमय नामसे परमात्माको ही लक्ष्य कराया गया है, अन्य किसी तत्त्वको नहीं, यह निश्चय कैसे हो सकता है? इसपर कहते हैं— आत्मशब्दाच्च ॥ ३। ३। १५ ॥ आत्मशब्दात् = आत्मशब्दका प्रयोग होनेके कारण; च = भी (यह सिद्ध हो जाता है)। व्याख्या— ऊपर कहे हुए कारणके सिवा, इस प्रकरणमें बारम्बार सबका अन्तरात्मा बताते हुए अन्तमें विज्ञानमयका अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाया है; उसके बाद उसका अन्तरात्मा दूसरे किसीको नहीं बतलाया। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि यहाँ आनन्दमय शब्द ब्रह्मका ही वाचक है। सम्बन्ध— 'आत्मा' शब्दका प्रयोग तो अधिकतर प्रत्यगात्मा (जीवात्मा)- का ही वाचक होता है। फिर यह निश्चय कैसे हुआ कि यहाँ 'आत्मा' शब्द ब्रह्मका वाचक है? इसपर कहते हैं— आत्मगृहीतिरितरवदुत्तरात् ॥ ३। ३। १६ ॥ आत्मगृहीतिः = आत्म-शब्दसे परमात्माका ग्रहण; इतरवत् = दूसरी श्रुतिकी भाँति; उत्तरात् = उसके बादके वर्णनसे (सिद्ध होता है)। व्याख्या— जिस प्रकार 'आत्मा वा इदमेकमेवाग्र आसीन्नान्यत् किञ्चन मिषत् स ईक्षत लोकान्नु सृजै', (ऐ० उ० १।१) 'पहले यह एक आत्मा ही
३२८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ था, उसने इच्छा की कि मैं लोकोंकी रचना करूँ।' (ऐ० उ० १।१।१) इस श्रुतिमें प्रजाकी सृष्टिके प्रकरणको लेकर 'आत्मा' शब्दका प्रयोग हुआ है, इसलिये यहाँ 'आत्मा' शब्दको ब्रह्मका वाचक माना गया। उसी प्रकार तैत्तिरीय-श्रुतिमें भी आनन्दमयका वर्णन करनेके बाद तत्काल ही सोऽकामयत बहु स्याम्— 'उसने इच्छा की कि मैं बहुत हो जाऊँ।' इत्यादि वाक्योंद्वारा उस आनन्दमय आत्मासे समस्त जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया गया है। अतः बादमें आये हुए इस वर्णनसे ही यह सिद्ध हो जाता है कि यहाँ 'आत्मा' शब्द परमात्माका ही वाचक है और 'आनन्दमय' नाम भी यहाँ उस परब्रह्मका ही है। सम्बन्ध— ऊपर कही हुई बातमें पुनः शंका उपस्थित करके उसका उत्तर देते हुए पूर्वोक्त सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं— अन्वयादिति चेत्स्यादवधारणात् ॥ १ । १ । १७ ॥ चेत् = यदि कहो कि; अन्वयात् = प्रत्येक वाक्यमें आत्मशब्दका अन्वय होनेके कारण यह सिद्ध नहीं होता कि आनन्दमय ब्रह्म है; इति = तो इसका उत्तर यह है कि; अवधारणात् = निर्धारित किये जानेके कारण; स्यात् = (आनन्दमय ही ब्रह्म है) यह बात सिद्ध हो सकती है। व्याख्या— यदि कहो कि 'तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीमें 'आत्मा' शब्दका प्रयोग तो सभी वाक्योंके अन्तमें आया है, फिर केवल 'आत्मा' शब्दके प्रयोगसे 'आनन्दमय' को ही ब्रह्म कैसे मान लिया जाय ?' तो इसके उत्तरमें कहते हैं कि जिस 'आत्मा' शब्दकी सभी वाक्योंमें व्याप्ति है, वह ब्रह्मका वाचक नहीं है; अपितु अन्तमें जिसको निर्धारित कर दिया गया है, वह ब्रह्मका वाचक है। अन्नमय, प्राणमय आदि आत्माओंको ब्रह्मका शरीर और ब्रह्मको उनका अन्तरात्मा बतलानेके उद्देश्यसे वहाँ सबके साथ 'आत्मा' शब्दका प्रयोग किया गया है। इसीलिये अन्नमयका अन्तरात्मा उससे भिन्न प्राणमयको बतलाया; फिर प्राणमयका अन्तरात्मा उससे भिन्न मनोमयको बतलाया और मनोमयका अन्तरात्मा विज्ञानमयको तथा विज्ञानमयका भी
सूत्र १८ ] अध्याय ३ ३२९
सूत्र १८ ] अध्याय ३ ३२९ अन्तरात्मा आनन्दमयको बतलाया। उसके बाद आनन्दमयका अन्तरात्मा अन्य किसीको नहीं बतलाया और अन्तमें यह निर्धारित कर दिया कि इसका शरीरसम्बन्धी आत्मा यह स्वयं ही है, जो कि पहले कहे हुए अन्य सब पुरुषोंका भी आत्मा है। यह कहकर उसीसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन किया। इस प्रकार यहाँ आनन्दमयको पूर्णरूपसे परमात्मा निश्चित कर दिया गया है। इसीसे यह सिद्ध होता है कि आनन्दमय शब्द परमात्माका वाचक है। सम्बन्ध—‘‘इस प्रकरणमें आत्मासे आकाशादि भूतोंकी उत्पत्तिका वर्णन करनेके बाद पृथिवीसे ओषधि, ओषधिसे अन्न और अन्नसे पुरुषकी उत्पत्ति बतलायी; फिर कहा कि 'निश्चयपूर्वक वही यह पुरुष अन्नरसमय है। इस वर्णनके अनुसार 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इस वाक्यद्वारा बतलाया हुआ ब्रह्म ही यहाँ अन्नरसमय पुरुष है या उससे भिन्न?'' इस जिज्ञासापर कहते हैं— कार्याख्यानादपूर्वम् ॥ ३।३।१८॥ कार्याख्यानात् = ब्रह्मका कार्य बतलाया जानेके कारण यह पुरुष; अपूर्वम् = वह पूर्वोक्त ब्रह्म नहीं हो सकता। व्याख्या—इस प्रकरणमें जिस अन्नरसमय पुरुषका वर्णन है, वह पूर्वोक्त परब्रह्म नहीं हो सकता, किंतु अन्नका परिणामभूत यह सजीव मनुष्य-शरीर ही यहाँ अन्नरसमय पुरुषके नामसे कहा गया है; क्योंकि इस पुरुषको उस पूर्वोक्त ब्रह्मका आकाशादिके क्रमसे कार्य बतलाया गया है और इसका अन्तरात्मा प्राणमय आदिके क्रमसे विज्ञानमय जीवात्माको बतलाया है तथा विज्ञानमयका आत्मा ब्रह्मको बतलाकर अन्तमें आनन्दके साथ उसकी एकता की गयी है। इसलिये जिनके 'सत्य', 'ज्ञान' और 'अनन्त' ये लक्षण बताये गये हैं तथा जो 'आत्मा' और 'आनन्दमय' नामसे जगत्का कारण बतलाया गया है, वह ब्रह्म इस अन्नरसमय पुरुषसे भिन्न सबका अन्तरात्मा है। सम्बन्ध—ग्यारहवें सूत्रसे 'आनन्द' के प्रकरणका विचार आरम्भ करके अठारहवें सूत्रतक उस प्रकरणको समाप्त कर दिया गया। अब
३३० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ पहले आरम्भ किये हुए प्रकरणपर दूसरी श्रुतियोंके विषयमें विचार आरम्भ किया जाता है— समान एवं चाभेदात् ॥ ३ । ३ । १९ ॥ समाने = एक शाखामें; च = भी; एवम् = इसी प्रकार विद्याकी एकता समझनी चाहिये; अभेदात् = क्योंकि दोनों जगह उपास्यमें कोई भेद नहीं है। व्याख्या—वाजसनेयी शाखाके शतपथ-ब्राह्मणमें 'सत्य ही ब्रह्म है इस प्रकार उपासना करनी चाहिये, निस्संदेह यह पुरुष संकल्पमय है। वह जितने संकल्पोंसे युक्त होकर इस लोकसे प्रयाण करता है, परलोकमें जानेपर वैसे ही संकल्पवाला होकर उत्पन्न होता है। वह मनोमय प्राण-शरीरवाले आकाश- स्वरूप आत्माकी उपासना करे।' इस प्रकार शाण्डिल्यविद्याका वर्णन किया गया है (श० ब्रा० १० । ६ । ३ । २)¹। उसी शाखाके बृहदारण्यकमें भी कहा है कि 'प्रकाश ही जिसका सत्य स्वरूप है वह पुरुष मनोमय है, वह धान और जौ आदिके सदृश सूक्ष्म परिमाणवाला है; वह उस हृदयाकाशमें स्थित है, वह सबका स्वामी और सबका अधिपति है तथा यह जो कुछ है, सभीका उत्तम शासन करता है।' (बृह० उ० ५ । ६ । १)² इन दोनों ग्रन्थोंमें कही हुई इन विद्याओंमें भेद है या अभेद ? यह संशय उपस्थित होनेपर सूत्रकार कहते हैं—जैसे भिन्न शाखाओंमें विद्याकी एकता और गुणोंका उपसंहार उचित माना गया है; उसी प्रकार एक शाखामें कही हुई विद्याओंमें भी एकता माननी चाहिये; क्योंकि वहाँ उपास्यमें भेद नहीं है। दोनों जगह एक ही ब्रह्म उपास्य बताया गया है। १-सत्यं ब्रह्मेत्युपासीत। अथ खलु क्रतुमयोऽयं पुरुषः सः यावत्क्रतुरयमस्माल्लोकात् प्रैति एवंक्रतुर्भूत्वामुं लोकं प्रेत्याभिसम्भवति स आत्मानमुपासीत मनोमयं प्राणशरीरं भारूपं सत्यसंकल्पमाकाशात्मानम्।' २-'मनोमयोऽयं पुरुषो भाः सत्यस्तस्मिन्नन्तर्हृदये यथा व्रीहिर्वा यवो वा स एष सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किञ्च ॥' (बृह० उ० ५ । ६ । १)
सूत्र २०-२१ ] अध्याय ३ ३३१
सूत्र २०-२१ ] अध्याय ३ ३३१ सम्बन्ध—उपास्यके सम्बन्धको लेकर किस जगह विद्याकी एकता माननी चाहिये और किस जगह नहीं ? इसका निर्णय करनेके लिये पूर्वपक्ष उपस्थित किया जाता है— सम्बन्धादेवमन्यत्रापि ॥ ३ । ३ । २० ॥ एवम्=इस प्रकार; सम्बन्धात्=उपास्यके सम्बन्धसे; अन्यत्र=दूसरी जगह; अपि=भी (क्या विद्याकी एकता मान लेनी चाहिये?)। व्याख्या—इसी प्रकार एक ही उपास्यका सम्बन्ध बृहदारण्यकमें देखा जाता है। वहाँ पहले कहा गया है कि सत्य ही ब्रह्म है, इत्यादि (बृह० उ० ५ । ५ । १), फिर इसी सत्यकी सूर्यमण्डलमें स्थित पुरुषके साथ और आँखमें स्थित पुरुषके साथ एकता की गयी है (बृह० उ० ५ । ५ । २)। उसके बाद दोनोंका रहस्यमय नाम क्रमशः 'अहर्' और 'अहम्' बतलाया है। इस प्रकरणमें एक ही उपास्यका सम्बन्ध होनेपर भी स्थान- भेदसे पृथक्-पृथक् दो उपासनाएँ बतायी गयी हैं, अतः इनमें भेद मानना चाहिये या अभेद ? सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें उठायी हुई शंकाका उत्तर अगले सूत्रमें देते हैं— न वा विशेषात् ॥ ३ । ३ । २१ ॥ न वा=इन दोनोंकी एकता नहीं माननी चाहिये; विशेषात्=क्योंकि इन दोनों पुरुषोंके रहस्यमय नाम और स्थानमें भेद किया गया है। व्याख्या—इन दोनों उपासनाओंके वर्णनमें स्थान और नाम भिन्न-भिन्न बताये गये हैं। सूर्यमण्डलमें स्थित सत्यपुरुषका तो रहस्यमय नाम 'अहर्' कहा है और आँखोंमें स्थित पुरुषका रहस्यमय नाम 'अहम्' बतलाया है। इस प्रकार नाम और स्थानका भेद होनेके कारण इन उपासनाओंकी एकता नहीं मानी जा सकती; अतएव एकके नाम और गुणका उपसंहार दूसरे पुरुषमें नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—इस बातको श्रुतिप्रमाणसे स्पष्ट करते हैं—
३३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
३३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ दर्शयति च॥ ३।३।२२॥ दर्शयति च=श्रुति यही बात दिखलाती भी है। व्याख्या—जहाँ इस प्रकार स्थान और नामका भेद हो, वहाँ एक जगह कहे हुए गुण दूसरी जगह नहीं लिये जाते; यह बात श्रुतिद्वारा इस प्रकार दिखलायी गयी है। छान्दोग्योपनिषद्में आधिदैविक सामके प्रसंगमें सूर्यस्थ पुरुषका वर्णन करके फिर आध्यात्मिक सामके प्रसंगमें आँखमें स्थित पुरुषका वर्णन किया गया है और वहाँ सूर्यस्थ पुरुषके नाम-रूप आदिका आँखमें स्थित पुरुषमें भी श्रुतिने स्वयं विधान करके दोनोंकी एकता की है (छा० उ० १।७।५)। इससे यह सूचित होता है कि ऐसे स्थलोंमें विद्याकी एकता मानकर एकके गुणोंका अन्यत्र उपसंहार साधारण नियम नहीं है; जहाँ विद्याकी एकता मानकर गुणोंका उपसंहार करना अभीष्ट होता है उस प्रसंगमें श्रुति स्वयं उसका विधान कर देती है जैसे कि उपर्युक्त प्रसंगमें सूर्यमें स्थित पुरुषके गुणोंका नेत्रवर्ती पुरुषमें विधान किया है। सम्बन्ध—नेत्रवर्ती तथा सूर्यमण्डलवर्ती आदि पुरुषोंमें ब्रह्मके किन- किन गुणोंका उपसंहार (अध्याहार) नहीं किया जा सकता ? इसका निर्णय ग्रन्थकार दो सूत्रोंद्वारा करते हैं— सम्भृतिद्युव्याप्त्यपि चातः॥ ३।३।२३॥ च=तथा; अतः =इसलिये अर्थात् विद्याकी एकता न होनेके कारण ही; सम्भृतिद्युव्याप्ती = समस्त लोकोंको धारण करना तथा द्युलोक आदि अखिल ब्रह्माण्डको व्याप्त करके स्थित होना—ये दोनों ब्रह्मसम्बन्धी गुण; अपि = भी अन्यत्र (नेत्रान्तर्वर्ती आदि पुरुषोंमें) नहीं लेने चाहिये। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद् (३।८।३)-में गार्गी और याज्ञवल्क्यके संवादका वर्णन आता है। वहाँ गार्गीने याज्ञवल्क्यसे पूछा है—'जो द्युलोकसे ऊपर है, जो पृथ्वीसे नीचे है और जो द्युलोक एवं पृथ्वीके मध्यमें है तथा स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं। इनके सिवा जिसे भूत, वर्तमान और भविष्य कहते हैं; वह सब किसमें ओतप्रोत है?' इसके उत्तरमें
याज्ञवल्क्यने कहा—'द्युलोकसे ऊपर और पृथिवीसे नीचेतक यह सब कुछ आकाशमें ओतप्रोत है।' (३।८।४) गार्गीने पूछा—'आकाश किसमें ओतप्रोत है?' (३।८।७)। याज्ञवल्क्य बोले—'गार्गि ! उस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्ता पुरुष अक्षर कहते हैं; वह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न बड़ा है, न लाल है, न चिकना है, न छाया है, न तम है, न वायु है, न आकाश है, न संग है, न रस है, न गन्ध है, न नेत्र है, न कान है, न वाणी है, न मन है, न तेज है, न प्राण है, न मुख है, न माप है, न भीतर है, न बाहर है, वह कुछ भी नहीं खाता, उसे कोई भी नहीं खाता।' (३।८।८) इस प्रकार अक्षरब्रह्मके स्वरूपका वर्णन करके याज्ञवल्क्यने यह भी बताया कि 'ये सूर्य, चन्द्रमा, द्युलोक और पृथिवी आदि इसीके शासनमें हैं, इसीने इन सबको धारण कर रखा है।' (३।८।९)। इस प्रसंगमें अक्षरब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करते हुए दो बातें मुख्यरूपसे बतायी गयी हैं, एक तो वह द्युलोकसे ऊपर और पृथिवीके नीचेतक समस्त ब्रह्माण्डमें व्याप्त है और दूसरी बात यह है कि वही सबको धारण करनेवाला है। इन दोनों गुणोंका नेत्रान्तर्वर्ती और सूर्यमण्डलवर्ती पुरुषोंमें अध्याहार नहीं किया जा सकता; क्योंकि प्रतीक-उपासनाके लिये सीमित स्थानोंमें स्थित कहे हुए पुरुष न तो सर्वव्यापक हो सकते हैं और न सबको धारण ही कर सकते हैं। इसी प्रकार अन्यत्र भी, जहाँ पूर्ण ब्रह्मका वर्णन नहीं है, उन प्रतीकोंमें इन गुणोंका उपसंहार नहीं हो सकता; यह भलीभाँति समझ लेना चाहिये। सम्बन्ध—'उक्त पुरुषोंमें ब्रह्मके गुणोंका उपसंहार न हो, यह तो ठीक है, परन्तु पुरुषविद्यामें जो पुरुषके गुण बताये गये हैं, उनका उपसंहार तो अन्यत्र जहाँ-जहाँ पुरुषोंका वर्णन हो, उन सबमें होना ही चाहिये।' ऐसी आशंका होनेपर कहते हैं— पुरुषविद्यायामिव चेतरेषामनाम्नानात् ॥ ३। ३। २४॥ पुरुषविद्यायाम् इव=पुरुषविद्यामें जो गुण बताये गये हैं, वैसे गुण; च=भी; इतरेषाम्=अन्य पुरुषोंके नहीं हो सकते; अनाम्नानात्=क्योंकि श्रुतिमें उनके ऐसे गुण कहीं नहीं बताये गये हैं।
व्याख्या - मुण्डकोपनिषद्में (२।१।२ से १० तक) अक्षरब्रह्मका पुरुषके नामसे वर्णन किया गया है। वहाँ पहले अक्षरब्रह्मसे सबकी उत्पत्ति और उन्हींमें सबका लय (२।१।१) बताकर उसे दिव्य अमूर्त पुरुष कहा गया है (२।१।२)। फिर २।१।३ से लेकर २।१।९ तक उसीसे समस्त प्राण, इन्द्रिय, पंचभूत, सूर्य, चन्द्रमा, वेद, अग्नि, देवता, मनुष्य, अन्न, समुद्र तथा पर्वत आदिकी सृष्टि बतायी गयी है। तदनन्तर २।१। १० वें मन्त्रमें उस पुरुषकी महिमाका इस प्रकार वर्णन किया गया है— 'पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम्। एतद् यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य॥' अर्थात् 'पुरुष ही यह सब कुछ है, वही तप, कर्म और परम अमृतस्वरूप ब्रह्म है। हे सोम्य ! हृदयरूप गुफामें स्थित इस अन्तर्यामी परम पुरुषको जो जानता है, वह यहीं इस मनुष्य-शरीरमें ही अविद्याजनित गाँठको छिन्न-भिन्न कर देता है।' इस प्रकार इस पुरुषविद्याके प्रकरणमें जो पुरुषके सर्वोत्पादकत्व, परात्परत्व, सर्वव्यापकत्व तथा अविद्यानिवारकत्व आदि दिव्य गुण बताये गये हैं, उनका भी नेत्रान्तर्वर्ती और सूर्यमण्डलवर्ती आदि पुरुषोंमें तथा जहाँ-जहाँ स्थूल, सूक्ष्म या कारण-शरीरका वर्णन पुरुषके नामसे किया गया है, उन पुरुषोंमें (छा० उ० ५।९।१) (तै० उ० २।१ से ७ तक) अध्याहार नहीं किया जा सकता; क्योंकि श्रुतिमें कहीं भी उनके लिये वैसे गुणोंका प्रतिपादन नहीं किया गया है। उन प्रकरणोंमें उन पुरुषोंके अन्तरात्मा परमपुरुषको लक्ष्य करानेके लिये उनको पुरुष नाम दिया गया है। सम्बन्ध—इसी प्रकार— वेधाद्यर्थभेदात् ॥ ३। ३। २५ ॥ वेधादि=बींधने आदिका वर्णन करके जो ब्रह्मको वेधका लक्ष्य बताया गया है, इन सबका अध्याहार भी अन्य विद्याओंमें नहीं करना चाहिये; अर्थभेदात् = क्योंकि वहाँ प्रयोजनमें भेद है। व्याख्या - मुण्डकोपनिषद् (२।२।३)-में कहा है कि-
सूत्र २६ ] अध्याय ३ ३३५
सूत्र २६ ] अध्याय ३ ३३५ धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं सन्धयीत। आयम्य तद् भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि॥ 'हे सोम्य ! उपनिषद्में वर्णित प्रणवरूप महान् धनुषको लेकर उसपर उपासनाद्वारा तीक्ष्ण किया हुआ बाण चढ़ाना चाहिये। फिर भावपूर्ण चित्तके द्वारा उस बाणको खींचकर तुम परम अक्षर परमेश्वरको ही लक्ष्य बनाकर उसे बींधो।' इस वर्णनके पश्चात् दूसरे मन्त्रमें आत्माको ही बाणका रूप दिया गया है। इस प्रकार यहाँ जो ब्रह्मको आत्मरूप बाणके द्वारा बींधने- योग्य बताया गया है; उसके इस वेध्यत्व आदि गुणोंका तथा ॐकारके धनुर्भाव और आत्माके बाणत्वका भी जहाँ ओंकारके द्वारा परमात्माकी उपासना करनेका प्रकरण है, उन ब्रह्मविद्याओंमें उपसंहार नहीं करना चाहिये; क्योंकि यहाँ चिन्तनमें तन्मयताका स्वरूप बतानेके लिये वैसा रूपक लिया गया है। इस तरह रूपककी कल्पनाद्वारा जो विशेष बात कही जाय, वे अन्य प्रकरणमें अनुपयुक्त होनेके कारण लेनेयोग्य नहीं हैं। सम्बन्ध — बीसवें सूत्रसे पचीसवें सूत्रतक भिन्न-भिन्न श्रुतियोंपर यह विचार किया गया कि उनमें कौन-कौन-सी बातें एक जगहसे दूसरी जगह अध्याहार करनेयोग्य नहीं हैं। अब परमगति अर्थात् परमधाम और परमात्माकी प्राप्तिविषयक श्रुतियोंपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। श्रुतियोंमें ब्रह्मविद्याका फल कहीं तो केवल दुःख, शोक, बन्धन और शुभाशुभ कर्मोंकी निवृत्तिमात्र बतलाया है; कहीं उसके पश्चात् परम समता, परमधाम और परमात्माकी प्राप्तिका भी वर्णन है। अतः ब्रह्मविद्याके फलमें भेद है या नहीं? इस जिज्ञासापर कहते हैं— हानौ तूपायनशब्दशेषत्वात्कुशाच्छन्दस्तुत्युप- गानवत्तदुक्तम् ॥ ३। ३। २६ ॥ हानौ = जहाँ केवल दुःख, शोक, पुण्य, पाप आदिके नाशका ही वर्णन है ऐसी श्रुतिमें; तु = भी; उपायनशब्दशेषत्वात् = लाभरूप परमधामकी प्राप्ति
३३६ | वेदान्त-दर्शन | [ पाद ३
३३६ | वेदान्त-दर्शन | [ पाद ३
आदि फलका भी अध्याहार कर लेना चाहिये; क्योंकि वह वाक्यका शेष भाग है; कुशाच्छन्दस्तुत्युपगानवत् = यह बात कुशा, छन्द, स्तुति और उपगानकी भाँति समझनी चाहिये; तत् उक्तम् = ऐसा पूर्वमीमांसामें कहा गया है। व्याख्या—उद्दालक आदि छः ऋषियोंको वैश्वानरविद्याका उपदेश देकर राजा अश्वपति कहते हैं कि जो इस विद्याको जानकर हवन करता है, उसके समस्त पाप उसी तरह भस्म हो जाते हैं, जिस प्रकार सींकका अग्रभाग अग्निमें डालनेसे हो जाता है। (छा० उ० ५। २४। ३) इसी प्रकार कठमें परमात्मज्ञानका फल कहीं केवल हर्ष-शोकका नाश (१। २। १२) और कहीं मृत्यु-मुखसे छूटना बताया गया है (१। ३। १५)। मुण्डकमें अविद्याका नाश (२। १। १०) और कहीं हृदयकी ग्रन्थि, समस्त संशय तथा कर्मोंका नाश कहा गया है (२। २। ८)। श्वेताश्वतरमें समस्त पाशोंसे छूट जाना (श्वे० उ० १। ११; २। १५; ४। १५, १६; ५। १३; ६। १३) तथा शोकका नाश होना (श्वे० उ० ४। ७) आदि ब्रह्मज्ञानका फल बताया गया है। इस प्रकार उपनिषदोंमें जगह-जगह ब्रह्मविद्याका फल पुण्य, पाप और नाना प्रकारके विकारोंका नाश बतलाया गया है; उन मन्त्रोंमें परमात्माकी या परमपदकी अथवा परमधामकी प्राप्ति नहीं बतलायी गयी। अतः सूत्रकार कहते हैं कि ऐसे स्थलोंमें जहाँ केवल दुःख, बन्धन एवं कर्मोंके त्याग या नाश आदिकी बात बतायी गयी है, उसके वाक्यशेषके रूपमें दूसरी जगह कहे हुए उपलब्धिरूप फलका भी अध्याहार कर लेना चाहिये। जैसे परमात्माका प्राप्त होना (मु० उ० ३। २। ८), ब्रह्मधामकी प्राप्ति (मु० उ० ३। २। ४) ब्रह्ममें लीन होना (मु० उ० ३। २। ५), ब्रह्मलोकमें परम अमृतस्वरूप हो जाना (मु० उ० ३। २। ६), अर्चि आदि मार्गसे ब्रह्मलोकमें जाकर वहाँसे न लौटना (छा० उ० ४। १५। ५) आदि ही फलका वर्णन है; भाव यह कि जहाँ-जहाँ केवल हानि-पापनाश आदिका वर्णन है, वहाँ-वहाँ ब्रह्मलोक आदिकी प्राप्ति वाक्यशेष है और जहाँ केवल उपायन (ब्रह्मधामकी प्राप्ति आदि)-का ही वर्णन है,
सूत्र २६ ] अध्याय ३ ३३७
सूत्र २६ ] अध्याय ३ ३३७ वहाँ पूर्वोक्त हानि (दुःखनाश आदि) ही वाक्यशेष है। इसलिये प्रत्येक समान विद्यामें उसका अध्याहार कर लेना चाहिये; जिससे किसी प्रकारका विकल्प या फलभेद न रहे। इस प्रकार वाक्यशेष ग्रहण करनेका दृष्टान्त सूत्रकार देते हैं—जैसे कौषीतकि शाखावालोंने सामान्यतः वनस्पतिमात्रकी कुशा लेनेके लिये कहा है। परंतु शाट्यायन शाखावाले उसके स्थानमें गूलरके काठकी बनी हुई कुशा लेनेके लिये कहते हैं; इसलिये उनका वह विशेष वचन कौषीतकिके सामान्य वचनका वाक्यशेष माना जाता है और दोनों शाखावाले उसे स्वीकार करते हैं। इसी तरह एक शाखावाले 'छन्दोभिः स्तुवीत' (देव और असुरोंके) छन्दोंद्वारा स्तुति करे, इस प्रकार समान भावसे कहते हैं। किंतु पैङ्गी शाखावाले 'देवोंके छन्द पहले बोलने चाहिये' इस प्रकार विशेषरूपसे क्रम नियत कर देते हैं, तो उस क्रमको पूर्व कथनका वाक्यशेष मानकर सभी स्वीकार करते हैं। जैसे किसी शाखामें 'षोडशिनः स्तोत्रमुपाकरोति' (षोडशीका स्तवन करे) ऐसा सामान्य वचन मिलता है, परंतु तैत्तिरीय शाखावाले इस कर्मको ऐसे समयमें कर्तव्य बतलाते हैं, जब ब्रह्मवेलामें तारे छिप गये हों और सूर्योदय नहीं हुआ हो। अतः यह कालविशेषका नियम पूर्वकथित वाक्यका शेष होकर सबको मान्य होता है। तथा एक शाखावाले स्तुतिगानके विषयमें समान भावसे कहते हैं कि 'ऋत्विज उपगायन्ति'—'ऋत्विज् लोग स्तोत्रका गान करें' किंतु दूसरी शाखावाले यह विधान करते हैं कि 'नाध्वर्युंरुपगायति'—'अध्वर्युको स्तोत्र-गान नहीं करना चाहिये।' अतः इसको भी वाक्यशेष मानकर सब यह स्वीकार करते हैं कि 'अध्वर्युको छोड़कर अन्य ऋत्विजोंद्वारा स्तोत्रोंका गान होना चाहिये।' उसी प्रकार जहाँ केवल पाप आदिके नाशकी ही बात कही है, ब्रह्मलोकादिकी प्राप्ति नहीं बतलायी गयी है, वहाँ प्राप्तिरूप फलको भी वाक्यशेषके रूपमें ग्रहण कर लेना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'देवयानमार्गसे ब्रह्मलोकमें जानेवाले महापुरुषके पापकर्म नष्ट हो जाते हैं, परंतु पुण्यकर्म तो शेष रहते
३३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
३३८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ ही होंगे, अन्यथा उसका ब्रह्मलोकमें गमन कैसे सम्भव होगा? क्योंकि ऊपरके लोकोंमें जाना शुभ कर्मोंका ही फल है।' इसपर कहते हैं— साम्पराये तर्तव्याभावात्तथा ह्यन्ये ॥ ३ । ३ । २७ ॥ साम्पराये = ज्ञानीके लिये परलोकमें; तर्तव्याभावात् = भोगके द्वारा पार करनेयोग्य कोई कर्मफल शेष नहीं रहता; इस कारण (उसके पुण्यकर्म भी यहीं समाप्त हो जाते हैं); हि = क्योंकि; तथा = यही बात; अन्ये = अन्य शाखावाले कहते हैं। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्में यह बात स्पष्ट शब्दोंमें बतायी गयी है कि ‘उभे उ हैवैष एते तरति।’ (४।४।२२) अर्थात् ‘यह ज्ञानी निश्चय ही पुण्य और पाप दोनोंको यहीं पार कर जाता है।’ इससे यह सिद्ध होता है कि ज्ञानी पुरुषका शरीर त्याग देनेके बाद शुभाशुभ कर्मोंसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता। उसे जो ब्रह्मलोक (नित्य धाम) प्राप्त होता है, वह किसी कर्मके फलरूपमें नहीं, अपितु ब्रह्मज्ञानके बलसे प्राप्त होता है। अतः उसके लिये परलोकमें जाकर भोगद्वारा पार करनेयोग्य कोई कर्मफल शेष नहीं रहता, इसलिये उसके पुण्यकर्म भी यहीं समाप्त हो जाते हैं। ज्ञानीके संचित आदि समस्त कर्मोंका सर्वथा नाश हो जाता है, इस बातका समर्थन मुण्डकोपनिषद्में भी इस प्रकार किया गया है—‘तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमं साम्यमुपैति ॥’ (मु० उ० ३।१।३)—‘उस समय ज्ञानी पुरुष पुण्य और पाप दोनोंको हटाकर निर्मल हो सर्वोत्तम साम्यरूप परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है।’ सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि ‘समस्त कर्मोंका नाश और ब्रह्मकी प्राप्तिरूप फल तो ब्रह्मज्ञानसे यहीं तत्काल प्राप्त हो जाता है। फिर देवयानमार्गसे ब्रह्मलोकमें जाकर परमात्माको प्राप्त करनेकी बात क्यों कही गयी है?’ इसपर कहते हैं— छन्दत उभयथाविरोधात् ॥ ३ । ३ । २८ ॥ छन्दतः = ज्ञानी पुरुषके संकल्पके अनुसार; उभयथा = दोनों प्रकारकी
सूत्र २९ ] अध्याय ३ ३३९
सूत्र २९ ] अध्याय ३ ३३९ स्थिति होनेमें; अविरोधात्=कोई विरोध नहीं है (इसलिये ब्रह्मलोकमें जानेका विधान है)। व्याख्या- छान्दोग्योपनिषद् (३।१४।१)-में कहा है कि 'अथ खलु क्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुरस्मँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति ॥' अर्थात् 'यह पुरुष निश्चय ही संकल्पमय है। इस लोकमें पुरुष जैसे संकल्पवाला होता है, वैसा ही देहत्यागके पश्चात् यहाँसे परलोकमें जानेपर भी होता है।' इससे यह सिद्ध होता है कि जो ज्ञानी पुरुष किसी लोकमें जानेकी इच्छा न करके यहीं मुक्त होनेका संकल्प रखता है, ब्रह्मज्ञानके लिये साधनमें प्रवृत्त होते समय भी जिसकी ऐसी ही भावना रही है, वह तो तत्काल यहीं ब्रह्म- सायुज्यको प्राप्त हो जाता है; परंतु जो ब्रह्मलोकके दर्शनकी इच्छा रखकर साधनमें प्रवृत्त हुआ था तथा जिसका वहाँ जानेका संकल्प है, वह देवयान- मार्गसे वहाँ जाकर ही ब्रह्मको प्राप्त होता है। इस प्रकार साधकके संकल्पानुसार दोनों प्रकारकी गति मान लेनेमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध - यदि इस प्रकार ब्रह्मलोकमें गये बिना यहाँ ही परमात्माको प्राप्त हो जाना मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है? इसपर कहते हैं- गतेरर्थवत्त्वमुभयथान्यथा हि विरोधः ॥ ३।३।२९॥ गतेः=गतिबोधक श्रुतिकी; अर्थवत्त्वम्=सार्थकता; उभयथा=दोनों प्रकारसे ब्रह्मकी प्राप्ति माननेपर ही होगी; हि=क्योंकि; अन्यथा=यदि अन्य प्रकारसे माने तो; विरोधः=श्रुतिमें परस्पर विरोध आयेगा। व्याख्या-श्रुतियोंमें कहीं तो तत्काल ही ब्रह्मकी प्राप्ति बतलायी है। (क० उ० २।३।१४, १५), कहीं ब्रह्मलोकमें जानेपर बतायी है (मु० उ० ३।२।६) अतः यदि उपर्युक्त दोनों प्रकारसे उसकी व्यवस्था नहीं मानी जायगी तो दोनों प्रकारका वर्णन करनेवाली श्रुतियोंमें विरोध आयेगा। इसलिये यही मानना ठीक है कि साधकके संकल्पानुसार दोनों प्रकारसे ही परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है। ऐसा माननेपर ही देवयानमार्गसे गतिका वर्णन करनेवाली श्रुतिकी सार्थकता होगी और श्रुतियोंका परस्पर विरोध भी दूर हो जायगा।
३४० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध—पुनः उसी बातको सिद्ध करते हैं— उपपन्नस्तल्लक्षणार्थोपलब्धेर्लोकवत् ॥ ३ । ३ । ३० ॥ तल्लक्षणार्थोपलब्धेः=उस देवयानमार्गद्वारा ब्रह्मलोकमें जानेके उपयुक्त सूक्ष्म शरीरादि उपकरणोंकी प्राप्तिका कथन होनेसे; उपपन्नः=उनके लिये ब्रह्मलोकमें जानेका कथन युक्तिसंगत है; लोकवत्=लोकमें भी ऐसा देखा जाता है। व्याख्या—श्रुतिमें जहाँ साधकके लिये देवयानमार्गके द्वारा ब्रह्मलोकमें जानेकी बात कही है, उस प्रकरणमें उसके उपयोगी उपकरणोंका वर्णन भी पाया जाता है। श्रुतिमें कहा है कि यह जीवात्मा जिस संकल्पवाला होता है, उस संकल्पद्वारा मुख्य प्राणमें स्थित हो जाता है। मुख्य प्राण उदान वायुमें स्थित हो मन-इन्द्रियोंसे युक्त जीवात्माको उसके संकल्पानुसार लोकमें ले जाता है। (प्र० उ० ३।१०) इसी तरह दूसरी जगह अर्चि- अभिमानी देवतादिको प्राप्त होना कहा है। (छा० उ० ५।१०।१, २) इस प्रकार समस्त कर्मोंका अत्यन्त अभाव हो जानेपर भी उसका दिव्य- शरीरसे सम्पन्न होना बतलाया गया है; किंतु जिन साधकोंको शरीर रहते हुए परब्रह्म परमेश्वर प्रत्यक्ष हो जाते हैं, उनके लिये वैसा वर्णन नहीं आता* (क० उ० २।३।१४); अपितु उनके विषयमें श्रुतिने इस प्रकार कहा है कि—‘योऽकामो निष्काम आप्तकाम आप्तकामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति॥’ (बृह० उ० ४।४।६) अर्थात् ‘जो कामनारहित, निष्काम, पूर्णकाम तथा केवल परमात्माको ही चाहनेवाला है, उसके प्राण ऊपरके लोकोंमें नहीं जाते। वह ब्रह्म होकर ही (यहीं) ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।’ इसलिये यही मानना सुसंगत है कि साधकके संकल्पानुसार दोनों प्रकारसे ही ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। लोकमें भी देखा जाता है कि जिसको अपने स्थानसे कहीं अन्यत्र जाना
- यह मन्त्र-सूत्र ३।४।५२ की टिप्पणीमें दे दिया गया है।
सूत्र ३१ ] अध्याय ३ ३४१
सूत्र ३१ ] अध्याय ३ ३४१ होता है, उसके साथ यात्रोपयोगी आवश्यक सामग्री रहती है; उसी प्रकार उपर्युक्त अधिकारी पुरुषके लिये दिव्य शरीर आदि उपकरणोंका वर्णन किया गया है, इसलिये उसका इस लोकसे ब्रह्मलोकमें जानेका कथन उचित ही है। सम्बन्ध - 'ब्रह्मविद्याका फल बताते हुए श्रुतिने बहुत जगह ब्रह्मलोकमें जानेकी बात तो कही है, परंतु देवयानमार्गसे जानेकी बात सर्वत्र नहीं कही है। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मलोकमें जानेवाले सभी ब्रह्मवेत्ता देवयानमार्गसे ही जाते हैं, या जिन-जिन विद्याओंके प्रकरणमें देवयानमार्गका वर्णन है, उन्हींके अनुसार उपासना करनेवाले पुरुष उस मार्गसे जाते हैं?' इसपर कहते हैं- अनियमः सर्वेषामविरोधः शब्दानुमानाभ्याम् ॥ ३ । ३ । ३१ ॥ अनियमः = ऐसा नियम नहीं है कि उन्हीं विद्याओंके अनुसार उपासना करनेवाले देवयानमार्गद्वारा जाते हैं; सर्वेषाम् = अपितु ब्रह्मलोकमें जानेवाले सभी साधकोंकी गति उसी मार्गसे होती है (यही बात); शब्दानुमानाभ्याम् = श्रुति और स्मृतियोंसे सिद्ध होती है (इसलिये); अविरोधः = कोई विरोध नहीं है। व्याख्या - श्रुतिमें कई जगह साधकको ब्रह्मलोक और परमधामकी प्राप्ति बतलायी गयी है, परंतु सब जगह देवयानमार्गका वर्णन नहीं है। उसी प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता आदि स्मृतियोंमें भी सब जगह मार्गका वर्णन नहीं है। अतः जहाँ ब्रह्मलोककी प्राप्ति बतलायी गयी है, वहाँ यदि मार्गका वर्णन न हो तो भी अन्य श्रुतियोंके वर्णनसे वह बात समझ लेनी चाहिये; क्योंकि ब्रह्मलोकमें गमन होगा तो किसी-न-किसी मार्गसे ही होगा। अतः यह नियम नहीं है कि जिन प्रकरणोंमें देवयानका वर्णन है, उसके अनुसार उपासना करनेवाले ही उस मार्गसे जाते हैं, दूसरे नहीं। अपितु जिनका ब्रह्मलोकमें गमन कहा गया है, वे सभी देवयानमार्गसे जाते हैं, ऐसा माननेसे श्रुतिके कथनमें किसी प्रकारका विरोध नहीं आयेगा। यहाँ यह भी समझ लेना चाहिये कि जो यहीं परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं, वे ब्रह्मलोकमें नहीं जाते।