वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३६ | वेदान्त-दर्शन | [ पाद ३
आदि फलका भी अध्याहार कर लेना चाहिये; क्योंकि वह वाक्यका शेष भाग है; कुशाच्छन्दस्तुत्युपगानवत् = यह बात कुशा, छन्द, स्तुति और उपगानकी भाँति समझनी चाहिये; तत् उक्तम् = ऐसा पूर्वमीमांसामें कहा गया है। व्याख्या—उद्दालक आदि छः ऋषियोंको वैश्वानरविद्याका उपदेश देकर राजा अश्वपति कहते हैं कि जो इस विद्याको जानकर हवन करता है, उसके समस्त पाप उसी तरह भस्म हो जाते हैं, जिस प्रकार सींकका अग्रभाग अग्निमें डालनेसे हो जाता है। (छा० उ० ५। २४। ३) इसी प्रकार कठमें परमात्मज्ञानका फल कहीं केवल हर्ष-शोकका नाश (१। २। १२) और कहीं मृत्यु-मुखसे छूटना बताया गया है (१। ३। १५)। मुण्डकमें अविद्याका नाश (२। १। १०) और कहीं हृदयकी ग्रन्थि, समस्त संशय तथा कर्मोंका नाश कहा गया है (२। २। ८)। श्वेताश्वतरमें समस्त पाशोंसे छूट जाना (श्वे० उ० १। ११; २। १५; ४। १५, १६; ५। १३; ६। १३) तथा शोकका नाश होना (श्वे० उ० ४। ७) आदि ब्रह्मज्ञानका फल बताया गया है। इस प्रकार उपनिषदोंमें जगह-जगह ब्रह्मविद्याका फल पुण्य, पाप और नाना प्रकारके विकारोंका नाश बतलाया गया है; उन मन्त्रोंमें परमात्माकी या परमपदकी अथवा परमधामकी प्राप्ति नहीं बतलायी गयी। अतः सूत्रकार कहते हैं कि ऐसे स्थलोंमें जहाँ केवल दुःख, बन्धन एवं कर्मोंके त्याग या नाश आदिकी बात बतायी गयी है, उसके वाक्यशेषके रूपमें दूसरी जगह कहे हुए उपलब्धिरूप फलका भी अध्याहार कर लेना चाहिये। जैसे परमात्माका प्राप्त होना (मु० उ० ३। २। ८), ब्रह्मधामकी प्राप्ति (मु० उ० ३। २। ४) ब्रह्ममें लीन होना (मु० उ० ३। २। ५), ब्रह्मलोकमें परम अमृतस्वरूप हो जाना (मु० उ० ३। २। ६), अर्चि आदि मार्गसे ब्रह्मलोकमें जाकर वहाँसे न लौटना (छा० उ० ४। १५। ५) आदि ही फलका वर्णन है; भाव यह कि जहाँ-जहाँ केवल हानि-पापनाश आदिका वर्णन है, वहाँ-वहाँ ब्रह्मलोक आदिकी प्राप्ति वाक्यशेष है और जहाँ केवल उपायन (ब्रह्मधामकी प्राप्ति आदि)-का ही वर्णन है,