भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 338

सूत्र २६ ] अध्याय ३ ३३५ धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं सन्धयीत। आयम्य तद् भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि॥ 'हे सोम्य ! उपनिषद्में वर्णित प्रणवरूप महान् धनुषको लेकर उसपर उपासनाद्वारा तीक्ष्ण किया हुआ बाण चढ़ाना चाहिये। फिर भावपूर्ण चित्तके द्वारा उस बाणको खींचकर तुम परम अक्षर परमेश्वरको ही लक्ष्य बनाकर उसे बींधो।' इस वर्णनके पश्चात् दूसरे मन्त्रमें आत्माको ही बाणका रूप दिया गया है। इस प्रकार यहाँ जो ब्रह्मको आत्मरूप बाणके द्वारा बींधने- योग्य बताया गया है; उसके इस वेध्यत्व आदि गुणोंका तथा ॐकारके धनुर्भाव और आत्माके बाणत्वका भी जहाँ ओंकारके द्वारा परमात्माकी उपासना करनेका प्रकरण है, उन ब्रह्मविद्याओंमें उपसंहार नहीं करना चाहिये; क्योंकि यहाँ चिन्तनमें तन्मयताका स्वरूप बतानेके लिये वैसा रूपक लिया गया है। इस तरह रूपककी कल्पनाद्वारा जो विशेष बात कही जाय, वे अन्य प्रकरणमें अनुपयुक्त होनेके कारण लेनेयोग्य नहीं हैं। सम्बन्ध — बीसवें सूत्रसे पचीसवें सूत्रतक भिन्न-भिन्न श्रुतियोंपर यह विचार किया गया कि उनमें कौन-कौन-सी बातें एक जगहसे दूसरी जगह अध्याहार करनेयोग्य नहीं हैं। अब परमगति अर्थात् परमधाम और परमात्माकी प्राप्तिविषयक श्रुतियोंपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। श्रुतियोंमें ब्रह्मविद्याका फल कहीं तो केवल दुःख, शोक, बन्धन और शुभाशुभ कर्मोंकी निवृत्तिमात्र बतलाया है; कहीं उसके पश्चात् परम समता, परमधाम और परमात्माकी प्राप्तिका भी वर्णन है। अतः ब्रह्मविद्याके फलमें भेद है या नहीं? इस जिज्ञासापर कहते हैं— हानौ तूपायनशब्दशेषत्वात्कुशाच्छन्दस्तुत्युप- गानवत्तदुक्तम् ॥ ३। ३। २६ ॥ हानौ = जहाँ केवल दुःख, शोक, पुण्य, पाप आदिके नाशका ही वर्णन है ऐसी श्रुतिमें; तु = भी; उपायनशब्दशेषत्वात् = लाभरूप परमधामकी प्राप्ति