भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 486 में से

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व्याख्या - मुण्डकोपनिषद्में (२।१।२ से १० तक) अक्षरब्रह्मका पुरुषके नामसे वर्णन किया गया है। वहाँ पहले अक्षरब्रह्मसे सबकी उत्पत्ति और उन्हींमें सबका लय (२।१।१) बताकर उसे दिव्य अमूर्त पुरुष कहा गया है (२।१।२)। फिर २।१।३ से लेकर २।१।९ तक उसीसे समस्त प्राण, इन्द्रिय, पंचभूत, सूर्य, चन्द्रमा, वेद, अग्नि, देवता, मनुष्य, अन्न, समुद्र तथा पर्वत आदिकी सृष्टि बतायी गयी है। तदनन्तर २।१। १० वें मन्त्रमें उस पुरुषकी महिमाका इस प्रकार वर्णन किया गया है— 'पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम्। एतद् यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य॥' अर्थात् 'पुरुष ही यह सब कुछ है, वही तप, कर्म और परम अमृतस्वरूप ब्रह्म है। हे सोम्य ! हृदयरूप गुफामें स्थित इस अन्तर्यामी परम पुरुषको जो जानता है, वह यहीं इस मनुष्य-शरीरमें ही अविद्याजनित गाँठको छिन्न-भिन्न कर देता है।' इस प्रकार इस पुरुषविद्याके प्रकरणमें जो पुरुषके सर्वोत्पादकत्व, परात्परत्व, सर्वव्यापकत्व तथा अविद्यानिवारकत्व आदि दिव्य गुण बताये गये हैं, उनका भी नेत्रान्तर्वर्ती और सूर्यमण्डलवर्ती आदि पुरुषोंमें तथा जहाँ-जहाँ स्थूल, सूक्ष्म या कारण-शरीरका वर्णन पुरुषके नामसे किया गया है, उन पुरुषोंमें (छा० उ० ५।९।१) (तै० उ० २।१ से ७ तक) अध्याहार नहीं किया जा सकता; क्योंकि श्रुतिमें कहीं भी उनके लिये वैसे गुणोंका प्रतिपादन नहीं किया गया है। उन प्रकरणोंमें उन पुरुषोंके अन्तरात्मा परमपुरुषको लक्ष्य करानेके लिये उनको पुरुष नाम दिया गया है। सम्बन्ध—इसी प्रकार— वेधाद्यर्थभेदात् ॥ ३। ३। २५ ॥ वेधादि=बींधने आदिका वर्णन करके जो ब्रह्मको वेधका लक्ष्य बताया गया है, इन सबका अध्याहार भी अन्य विद्याओंमें नहीं करना चाहिये; अर्थभेदात् = क्योंकि वहाँ प्रयोजनमें भेद है। व्याख्या - मुण्डकोपनिषद् (२।२।३)-में कहा है कि-

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