वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 336, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंयाज्ञवल्क्यने कहा—'द्युलोकसे ऊपर और पृथिवीसे नीचेतक यह सब कुछ आकाशमें ओतप्रोत है।' (३।८।४) गार्गीने पूछा—'आकाश किसमें ओतप्रोत है?' (३।८।७)। याज्ञवल्क्य बोले—'गार्गि ! उस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्ता पुरुष अक्षर कहते हैं; वह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न बड़ा है, न लाल है, न चिकना है, न छाया है, न तम है, न वायु है, न आकाश है, न संग है, न रस है, न गन्ध है, न नेत्र है, न कान है, न वाणी है, न मन है, न तेज है, न प्राण है, न मुख है, न माप है, न भीतर है, न बाहर है, वह कुछ भी नहीं खाता, उसे कोई भी नहीं खाता।' (३।८।८) इस प्रकार अक्षरब्रह्मके स्वरूपका वर्णन करके याज्ञवल्क्यने यह भी बताया कि 'ये सूर्य, चन्द्रमा, द्युलोक और पृथिवी आदि इसीके शासनमें हैं, इसीने इन सबको धारण कर रखा है।' (३।८।९)। इस प्रसंगमें अक्षरब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करते हुए दो बातें मुख्यरूपसे बतायी गयी हैं, एक तो वह द्युलोकसे ऊपर और पृथिवीके नीचेतक समस्त ब्रह्माण्डमें व्याप्त है और दूसरी बात यह है कि वही सबको धारण करनेवाला है। इन दोनों गुणोंका नेत्रान्तर्वर्ती और सूर्यमण्डलवर्ती पुरुषोंमें अध्याहार नहीं किया जा सकता; क्योंकि प्रतीक-उपासनाके लिये सीमित स्थानोंमें स्थित कहे हुए पुरुष न तो सर्वव्यापक हो सकते हैं और न सबको धारण ही कर सकते हैं। इसी प्रकार अन्यत्र भी, जहाँ पूर्ण ब्रह्मका वर्णन नहीं है, उन प्रतीकोंमें इन गुणोंका उपसंहार नहीं हो सकता; यह भलीभाँति समझ लेना चाहिये। सम्बन्ध—'उक्त पुरुषोंमें ब्रह्मके गुणोंका उपसंहार न हो, यह तो ठीक है, परन्तु पुरुषविद्यामें जो पुरुषके गुण बताये गये हैं, उनका उपसंहार तो अन्यत्र जहाँ-जहाँ पुरुषोंका वर्णन हो, उन सबमें होना ही चाहिये।' ऐसी आशंका होनेपर कहते हैं— पुरुषविद्यायामिव चेतरेषामनाम्नानात् ॥ ३। ३। २४॥ पुरुषविद्यायाम् इव=पुरुषविद्यामें जो गुण बताये गये हैं, वैसे गुण; च=भी; इतरेषाम्=अन्य पुरुषोंके नहीं हो सकते; अनाम्नानात्=क्योंकि श्रुतिमें उनके ऐसे गुण कहीं नहीं बताये गये हैं।