वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 326, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ९ ] अध्याय ३ ३२३ सिद्ध नहीं हो सकती) तो; तदुक्तम् = उसका उत्तर (सूत्र ३।३।१ में) दे चुके हैं; तु = तथा; तदपि = वह (संज्ञाभेदके कारण होनेवाली विद्याविषयक विषमता) भी; अस्ति = अन्यत्र है। व्याख्या — यदि कहो कि उसमें संज्ञाका अर्थात् नामका भेद है; उस विद्याका नाम दहरविद्या है और दूसरीका नाम प्राजापत्यविद्या है; इसलिये दोनोंकी एकता नहीं हो सकती तो इसका उत्तर हम पहले सूत्र (३।३।१)-में ही दे चुके हैं। वहाँ बता आये हैं कि समस्त उपनिषदोंमें भिन्न-भिन्न नामोंसे जिन ब्रह्मविद्याओंका वर्णन है, उन सबमें विधिवाक्य, फल और उद्देश्य-विधेय आदिकी एकता होनेसे सब ब्रह्मविद्याओंकी एकता है। इसलिये यहाँ संज्ञाभेदसे कोई विरोध नहीं है। इसके सिवा, जिनमें उद्देश्य-विधेय और फल आदिकी समानता नहीं है, उन विद्याओंमें संज्ञा आदिके कारण भेद होता है और वैसी विद्याओंका वर्णन भी उपनिषदोंमें है ही (छा० उ० ३।१८।१ तथा ३।१९।१)। सम्बन्ध — नामका भेद होनेपर भी विद्यामें एकता हो सकती है, इस बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा कारण बतलाते हैं— व्याप्तेश्च समंजसम् ॥ ३।३।९ ॥ व्याप्तेः = ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है, इस कारण; च = भी; समंजसम् = ब्रह्म- विद्याओंमें समानता है। व्याख्या — परब्रह्म परमात्मा सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ है, इसलिये ब्रह्मविषयक विद्याके भिन्न-भिन्न नाम और प्रकरण होनेपर भी उनकी एकता होना उचित है, क्योंकि उन ब्रह्मविषयक सभी विद्याओंका उद्देश्य एकमात्र परब्रह्म परमात्माके ही स्वरूपका नाना प्रकारसे प्रतिपादन करना है। सम्बन्ध — अब यह जिज्ञासा होती है कि विद्याओंकी एकता और भिन्नताका निर्णय करनेके लिये प्रकरण, संज्ञा और वर्णनकी एकता और भेदकी अपेक्षा है या नहीं? इसपर कहते हैं—