भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 390

सूत्र २६ ] अध्याय ३ ३८७ सम्बन्ध— यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि क्या ब्रह्मविद्याका किसी भी यज्ञ-यागादि अथवा शम-दमादि कर्मोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, क्या इसमें किसी भी कर्मकी आवश्यकता नहीं है? अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् ॥ ३।४।२६॥ च = इसके सिवा; सर्वापेक्षा = विद्याकी उत्पत्तिके लिये समस्त वर्णा- श्रमोचित कर्मोंकी आवश्यकता है; यज्ञादिश्रुतेः = क्योंकि यज्ञादि कर्मोंको ब्रह्मविद्यामें हेतु बतानेवाली श्रुति है; अश्ववत् = जैसे घोड़ा योग्यतानुसार सवारीके काममें ही लिया जाता है, प्रासादपर चढ़नेके कार्यमें नहीं; उसी प्रकार कर्म विद्याकी उत्पत्तिके लिये अपेक्षित है, मोक्षके लिये नहीं। व्याख्या—'यह सर्वेश्वर है, यह समस्त प्राणियोंका स्वामी है' इत्यादि वचनोंसे परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करके श्रुतिमें कहा है कि 'इस परमेश्वरको ब्राह्मणलोग निष्कामभावसे किये हुए स्वाध्याय, यज्ञ, दान और तपके द्वारा जाननेकी इच्छा करते हैं। इसीको जानकर मनुष्य मननशील होता है, इस संन्यासियोंके लोकको पानेकी इच्छासे मनुष्यगण संन्यास ग्रहण करते हैं।' इत्यादि (बृह० उ० ४।४।२२)। तथा दूसरी श्रुतिमें भी कहा है कि 'जिस परमपदका सब वेद बार-बार प्रतिपादन करते हैं; समस्त तप जिसका लक्ष्य कराते हैं अर्थात् जिसकी प्राप्तिके साधन हैं तथा जिसको चाहनेवाले लोग ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, उस पदको मैं तुझे संक्षेपमें कहता हूँ' (क० उ० १।२।१५) इत्यादि। श्रुतिके इन वचनोंसे यह सिद्ध होता है कि परमात्माके तत्त्वको जाननेके लिये सभी वर्णाश्रमोचित कर्मोंकी आवश्यकता है। इसीलिये भगवान्ने भी गीता (१८।५-६) में कहा है— यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥