भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 389, कुल 486 में से

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पृष्ठ 389

३८६ वेदान्त-दर्शन [पाद ४ वहाँ कही हुई विद्याओंका ही अंग मानना उचित है; क्योंकि सन्निकट होनेसे इन विद्याओंके साथ ही इनका सम्बन्ध हो सकता है। विद्यामें रुचि उत्पन्न करने तथा परब्रह्मके स्वरूपका तत्त्व सरलतासे समझनेके लिये ही इन कथाओंका उपयोग किया गया है। इस प्रकार इनका उन प्रकरणोंमें वर्णित विद्याओंके साथ एकवाक्यता रूप सम्बन्ध है, इसलिये ये सब आख्यान ब्रह्मविद्याके ही अंग हैं, कर्मोंके नहीं; ऐसा मानना ही ठीक है। सम्बन्ध - यहाँतक यह बात सिद्ध की गयी कि ब्रह्मविद्या यज्ञादि कर्मोंका अंग नहीं है तथा वह स्वयं बिना किसी सहायताके परमपुरुषार्थको सिद्ध करनेमें समर्थ है। अब पुनः इसीका समर्थन करते हुए इस प्रकरणके अन्तमें कहते हैं— अतएव चाग्नीन्धनाद्यनपेक्षा ॥ ३।४।२५ ॥ च= तथा; अतएव = इसीलिये; अग्नीन्धनाद्यनपेक्षा= इस ब्रह्मविद्यारूप यज्ञमें अग्नि, समिधा, घृत आदि पदार्थोंकी आवश्यकता नहीं है। व्याख्या- यह ब्रह्मविद्यारूप यज्ञ अपना ध्येय सिद्ध करनेमें सर्वथा समर्थ है। यह पूर्ण होते ही स्वयं परमात्माका साक्षात्कार करा देता है। इसीलिये इस यज्ञमें अग्नि, समिधा, घृत आदि भिन्न-भिन्न पदार्थोंका विधान न करके केवल एक परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका ही प्रतिपादन किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीतामें भी भगवान् श्रीकृष्णने इस बातका समर्थन इस प्रकार किया है— ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥ (४।२४) 'उस ब्रह्मचिन्तनरूप यज्ञमें भिन्न-भिन्न उपकरण और सामग्री आवश्यक नहीं होती, किंतु उसमें तो स्रुवा भी ब्रह्म है, हवि भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप अग्निमें ब्रह्मरूप होताद्वारा ब्रह्मरूप हवनक्रिया की जाती है, उस ब्रह्मचिन्तनरूप कर्ममें समाहित हुए साधकद्वारा जो प्राप्त किया जानेवाला फल है, वह भी ब्रह्म ही है।' इस प्रकार यह ब्रह्मविद्या उस परमपुरुषार्थकी सिद्धिमें सर्वथा स्वतन्त्र होनेके कारण कर्मकी अंगभूत नहीं हो सकती।