भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 388, कुल 486 में से

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पृष्ठ 388

सूत्र २३-२४ ] अध्याय ३ ३८५ पारिप्लवार्था इति चेन्न विशेषितत्वात् ॥ ३।४।२३॥ चेत् = यदि कहो; पारिप्लवार्थाः = उपनिषदोंमें वर्णित आख्यायिकाएँ पारिप्लव नामक कर्मके लिये हैं; इति न = तो यह ठीक नहीं है; विशेषितत्वात् = क्योंकि पारिप्लव-कर्ममें कुछ ही आख्यायिकाओंको विशेषरूपसे ग्रहण किया गया है। व्याख्या—'उपनिषदोंमें जो यम और नचिकेता, देवता और यक्ष, मैत्रेयी और याज्ञवल्क्य, प्रतर्दन और इन्द्र, जानश्रुति और रैक्व तथा याज्ञवल्क्य और जनक आदिकी कथाएँ आती हैं, वे यज्ञ-सम्बन्धी पारिप्लव नामक कर्मकी अंगभूत हैं; क्योंकि 'पारिप्लवमाचक्षीत' ('पारिप्लव' नामक वैदिक उपाख्यान कहे) इस विधि-वाक्यद्वारा श्रुतिमें उसका स्पष्ट विधान किया है। अश्वमेधयागमें जो रात्रिके समय कुटुम्बसहित बैठे हुए राजाको अध्वर्यु उपाख्यान सुनाता है, वही 'पारिप्लव' कहलाता है। इस पारिप्लव कर्मके लिये ही उपर्युक्त कथाएँ हैं। ऐसा यदि कोई कहे तो ठीक नहीं है; क्योंकि पारिप्लवका प्रकरण आरम्भ करके श्रुतिने 'मनुर्वैवस्वतो राजा' इत्यादि वाक्योंद्वारा कुछ विशेष उपाख्यानोंको ही वहाँ सुनानेयोग्य कहा है। उनमें ऊपर बतायी हुई उपनिषदोंकी कथाएँ नहीं आती हैं। अतः वे पारिप्लव- कर्मकी अंगभूत नहीं हैं। वे सब आख्यान ब्रह्मविद्याको भलीभाँति समझानेके लिये कहे हुए ब्रह्मविद्याके ही अंग हैं। इसीलिये इन सब आख्यानोंका विशेष माहात्म्य बतलाया गया है (क० उ० १।३।१६)। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको दृढ़ करते हैं— तथा चैकवाक्यतोपबन्धात् ॥ ३।४।२४॥ तथा च = इस प्रकार उन आख्यायिकाओंको पारिप्लवार्थक न मानकर विद्याका ही अंग मानना चाहिये; एकवाक्यतोपबन्धात् = क्योंकि उन उपाख्यानोंकी वहाँ कही हुई विद्याओंके साथ एकवाक्यता देखी जाती है। व्याख्या—इस प्रकार उन कथाओंको पारिप्लवकर्मका अंग न मानकर