वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 387, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें३८४ वेदान्त-दर्शन [पाद ४ अंगकी स्तुतिमात्र है, इसलिये विद्या कर्मका अंग है; तो यह कहना उचित नहीं है, क्योंकि वे उपासनाएँ और उनके सम्बन्धसे बनाये हुए गुण अपूर्व हैं। जो अन्य किसी प्रमाणसे प्राप्त न हो, उसे अपूर्व कहते हैं। इन उपासनाओं और उनके गुणोंका न तो अन्यत्र कहीं वर्णन है और न अनुमान आदिसे ही उनका ज्ञान होता है; अतः उन्हें अपूर्व माना गया है, इसलिये यह कथन स्तुतिके लिये नहीं किंतु उद्गीथ आदिको प्रतीक बनाकर उसमें उपास्यदेवकी भावना करनेके लिये स्पष्ट प्रेरणा देनेवाला विधिवाक्य है। अतः विद्या कर्मका अंग नहीं है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको पुष्ट करते हैं— भावशब्दाच्च ॥ ३।४।२२॥ च=इसके सिवा; (उस प्रकरणमें) भावशब्दात्=इस प्रकार उपासना करनी चाहिये इत्यादि विधिवाचक शब्दोंका स्पष्ट प्रयोग होनेके कारण भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—केवल अपूर्व होनेसे ही उसे विधि-वाक्य माना जाता हो, ऐसी बात नहीं है। उस प्रकरणमें 'उद्गीथकी उपासना करनी चाहिये' (छा० उ० १।१।१) 'सामकी उपासना करनी चाहिये' (छा० उ० २।२।१) इत्यादि रूपसे अत्यन्त स्पष्ट विधिसूचक शब्दोंका प्रयोग भी है। जैसे उनकी अपूर्व विधि है, उसी प्रकार उन-उन उपासनाओंका अपूर्व फल भी बतलाया गया है (छा० उ० १।१।७; १।७।९ और २।२।३) इसलिये यह सिद्ध हुआ कि वह कथन कर्मके अंगभूत उद्गीथ आदिकी स्तुतिके लिये नहीं है, उनको प्रतीक बनाकर उपासनाका विधान करनेके लिये है और इसीलिये विद्या कर्मका अंग नहीं है। सम्बन्ध—भिन्न-भिन्न प्रकरणोंमें जो आख्यायिकाओंका (इतिहासोंका) वर्णन है, उसका क्या अभिप्राय है? इसका निर्णय करके विद्या कर्मका अंग नहीं है यह सिद्ध करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—